General and Important Hindi Posts

General and Important Hindi Posts 





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गुरु पूर्णिमा पर जीवित गुरु कि वंदना समाप्त होनी चाहीये, यही सनातन है 
https://awara32.blogspot.com/2017/07/stop-worshipping-gurus.html

समझिये, और यदि इसको अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते हैं तो चर्चा, शेयर भी करीए !
गुरु पूर्णिमा पर गुरु वंदना का बहिष्कार होना चाहीये !
निर्णय कठिन है क्यूँकी अपने वर्षो से चले आ रहे संस्कार से लड़ना होगा !
पिछले ४० वर्षो से इसका दुष्यपरिणाम सरकारी संस्थानों मैं , विश्वविद्यालयों में और यहाँ तक निजी कम्पनीयों में मैं देख रहा हूँ !

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ब्रह्मा विष्णु महेश, एक व्यवहारिक सकारात्मक दृष्टिकोण जो सनातन है
http://awara32.blogspot.com/2017/06/simple-meaning-of-brahma-vishnu-mahesh.html 

सनातन धर्म व्यवहारिक (PRACTICAL) है,
इसलिए इसमें गूढ़ कुछ भी नहीं है...
क्यूंकि व्यवहारिक बाते सरल होती हैं, आम आदमी भी समझ सकता है !
किसी ज्ञानी से पूछीये कि श्रृष्टि रचेता ब्रह्मा जी के मंदिर क्यूँ नहीं हैं, जगह जगह पर , आपको कहानी किस्से के साथ बहुत गूढ़ अर्थ समझा दिया जाएगा , और उसका सामान्य जीवन से कुछ लेना देना नहीं होगा |

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कथा और इतिहास में वास्तविक अंतर, इसको समाज सुधार हेतु समझना अपनाना है
http://awara32.blogspot.com/2017/03/katha-is-different-from-history.html 

मुझे तुलसीदास जी द्वारा रचित ‘मानस’ में पूर्ण आस्था है, और मेरे घर पर सब शुभकार्यो का आरम्भ मानस के पाठ से ही होता है | छोटा शुभ कार्य हो तो, सुंदरकाण्ड का पाठ करके शुभ आरम्भ कर दिया, बड़े में, पूरे मानस का पाठ !
मानस एक कथा है, और राम का त्रेतायुग के काल का आकलन इतिहास से हो सकता है | उसी तरह से पुराण और महाभारत को भी, कथा के रूप में ही अब तक लोगो ने समझा है | सिर्फ और सिर्फ भावनात्मक बोध है कि रामायण, महाभारत और समस्त पुराण इतिहास हैं, और चुकी समस्त ग्रन्थ संस्कृत में हैं, तो इसको इतिहास के रूप में प्रस्तुति करने का कार्य संस्कृत विद्वानों का था, जो नहीं हुआ |


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सत्य को मत दबाओ...सनातन में गुरु नहीं, भौतिक मानक और मापदंड आदर्श हैं

मालूम नहीं क्यूँ संस्कृत विद्वान और धर्मगुरु वोह सब भी समाज को गलत बता पा रहे हैं, जिसपर की एक शिक्षित समाज को सवाल पूछने चाहीये | लकिन समाज की मानसिकता तो पूरी तरह से ‘गुलामी’ की होगयी है, इसलिए समाज शिक्षित होने पर भी गलत बाते भी स्वीकार कर लेता है , जिसका परिणाम भौतिक स्तर पर आप भारत के अंदर देख सकते हैं | 

बहुल हिन्दू समाज भारत में ही द्वित्य श्रेणी का नागरिक है, उसकी कोइ भी बात मानी नहीं जाती, उसके देवी देवताओ के अभ्रद्र चित्र और चरित बनाया/बताया जा सकता है | जबकी अल्पसख्यक अन्य धर्मों/मजहबो के समाज और लोगो के साथ ऐसा दुसाहस कोइ नहीं कर सकता |

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समाज को कर्मठ बनाना है तो पुराण प्रभु के अवतरण को इतिहास मानो कथा नहीं

मित्रो ..या तो OPPOSE करो..या SUPPORT.!
लकिन हीजड़ापन छोड़ो....!
और हाँ; सिर्फ like करदेने को, या ‘जय श्री कृष्ण’ या जय श्री राम’ के कमेंट को भी हीजड़ापन ही कहा जा सकता है...जहाँ गंभीर प्रश्न विचारणीय हों !
प्रश्न यह है कि :::>>>
हिन्दू समाज को कर्महीन से कर्मठ बनाने का कार्य,....
के अतिरिक्त हमसब का FB या अन्य सोशल साइट्स पर कोइ धर्म है...?

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विद्वानों ने नीतिगत और योजना बना कर हिन्दू समाज को गुलामी की शिक्षा दी

जैसे की शीर्षक से समझ में आ रहा है, यह एक अत्यंत गंभीर विषय है, और आरोप भी | इसलिए इस विषय पर पूरे तथ्य और सूचना निकालना हर हिन्दू का कर्तव्य है , क्यूंकि इस विषय से भागा तो नहीं जा सकता | समाज, विदेशी हमलावरों का १००० से अधिक वर्षो की गुलामी झेल चूका है | इससे पहले की स्तिथि भी सामान्य नागरिक के लिए कष्टदायक और अंदरूनी शोषण से भरी हुई थे , तथा यह ऐतिहासिक सत्य है | और आज भी , प्रजातंत्र होने के पश्च्यात भी, बहुल हिन्दू समाज अपने ही देश में द्वित्य श्रेणी का नागरिक है |


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पाखण्ड से लड़ना है तो आदर्श ना ढूँढो ना बनो..पाखण्ड आदर्शवाद से शुरू होताहै

सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगो को संस्कारों के कारण एक आदत हो गयी है कि वोह हर व्यक्ति की छबि उसके काम के अनुरूप, और जो उनलोगों ने सुन और समझ रखा है, उसके अनुकूल देखना चाहते हैं | यानी की मार्केटिंग का असर, पूरी तरह से उनके मस्तिक में घुस गया है | ऐसे लोग ठगे जा सकते हैं, लकिन साहस नहीं कर पायेंगे की एक ईमानदारी से दिया हुआ सन्देश और ‘आदर्शवादी’ परन्तु पाखंडी व्यक्ति’ द्वारा दिया हुआ सन्देश के अंतर को पहचाने | और इतिहास तो झूट नहीं बोलता, कमसे कम पिछले ५००० वर्षो से यही हो रहा है |

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वेदान्त ज्योतिष युवा वर्ग के लिए आवश्यक भविष्य रुझान सम्बंधित टूल है 

इस पोस्ट का उद्देश युवा वर्ग को यह अवगत कराना है कि वेदान्त ज्योतिष एक अत्यंत आधुनिक, कारगर ज्ञान है, जिसका प्रयोग करके किसी भी विषय में भविष्य में ‘प्रवति और रुझान’ सम्बंधित जानकारी प्राप्त करी जा सकती है | शिक्षा के विस्तार के साथ अनेक विषयों में ‘प्रवति और रुझान’ से सम्बंधित पाठ्य कार्यकर्म हैं | जो युवा इस दिशा में शिक्षा ले रहे हैं, और कुछ निपुर्नता प्राप्त कर रहे हैं, वे आर्थिक दृष्टि से समृद्ध भी हैं , लकिन ऐसा कोइ पाठ्य कार्यकर्म नहीं है जो हर विषय में प्रयोग हो सके | विश्व स्तर पर कुछ लोग एस्ट्रोलॉजी का प्रयोग कर रहे हैं, बहुत ज्यादा कामयाबी नहीं मिल पा रही , और लोगो को यह नहीं मालूम कि एस्ट्रोलॉजी और वेदान्त ज्योतिष में अंतर है |

जहाँ एस्ट्रोलॉजी असफल होती है, भारत मैं कुछ लोग सीधे प्रहार वेदान्त ज्योतिष पर करना शुरू कर देते हैं , जबकी फिर से,.... एस्ट्रोलॉजी और वेदान्त ज्योतिष में अंतर है |

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धर्म मजहब क्या है, क्यूँ ईश्वर एक ही है, का सत्य कभी पूरा होता नहीं दिखा

LEAVING SANATAN DHARM, ALL RELIGIONS ARE DESIGNED CONTENT BASED PROJECTS ENSURING COHESIVENESS AND COORDINATION WITHEN THE SOCIETY FOLLOWING THAT RELIGION SO THAT THEY CAN EXPAND WITH OR WITHOUT USING FORCE~~आप सबने टीवी , सिनेमा घरो में छोटी छोटी समान बेचने से सम्बंधित विज्ञापन फ़िल्में तो देखी होंगी | वे सब DESIGNED CONTENT BASED PROJECT होता है, जिसका उद्देश आपको एक निश्चित समान को खरीदने की सोच की तरफ ले जाना होता है | 

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श्राद्ध क्यूँ करें और कैसे; तथा पितृदोष क्या है, और क्या उसका निवारण है?

अधिकाँश लोग पितृदोष से प्रभावित होते हैं, और, जैसा कि पितृदोष शब्द से समझ में आता है, इसका एक प्रभाव यह भी होता है, कि आपकी संतान भी पितृदोष से प्रभावित होजाति है ! पितृदोष निवारण का अब आप पूरा अर्थ(ध्यान दें, अभी आप निवारण का अर्थ समझ रहे हैं, तरीका नहीं) भी समझ लीजिये, जो कि शब्द से ही मिल रहा है :-

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हिन्दू समाज में सुधार करने के इच्छुक कृपया इस पोस्ट पर कमेंट अवश्य करें

मुझे अनेक लोग सोशल साइट्स पर मिलते हैं, जो पूर्ण इच्छा शक्ति से, इमानदारी से समाज में सुधार करना चाहते हैं, हिन्दू समाज को कर्महीन से कर्मठ बना कर एकजुट करना चाहता हैं | में उन सबका नमन करता हूँ !
लकिन सुधार होगा कैसे, क्या यह बिना किसी प्रोफेशनल कार्यक्रम के संभव है ? किसको क्या सन्देश देना है, किन कारणों से समाज की यह दुर्गति हो रही है , उस सबका आकलन और उसका समाधान पर भी कभी विचार विमश होते नहीं देखा |

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भक्ति का विस्तार और अर्थ...जिसको समझे बिना कष्ट से छुटकारा नहीं है

‘जो मुझमें ध्यान लगाएगा, वोह कभी दुःख नहीं पायेगा’..ईश्वर वाणी !
बिलकुल सही, लकिन अब यह समझना है की आप ईश्वर में ध्यान कैसे लगाएं?
अनेक मार्ग शास्त्रों में बताए गए है, कर्म, भक्ति, साधना जिनमें प्रमुख है| और अब एक नई सोच, शोषण हेतु उसमें और जुड़ गयी है, गुरु के आश्रम में जा कर सेवा!

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जबजब होइ धर्म की हानि..क्या धर्म की हानि बिना धर्मगुरु के पतन के संभव है?

रामायण का,  कमसेकम ५००,००० वर्ष पुराना इतिहास है, लकिन उसे इस तरह से प्रस्तुत करा जाता रहा है कि किसी को कुछ समझ मैं ना आए कि रामायण के समय श्री विष्णु को अवतरित होने के कारण क्या थे, और श्री विष्णु को एक नहीं दो बार, एक के बाद एक अवतार लेना पड़ा, पहले परशुराम के रूप मैं, और फिर श्री राम के रूप मैं, क्यूँ? 

यह समझा दिया गया कि पहले अवतार परशुराम क्षत्रियों के अत्याचार को समाप्त करने आय थे, और दुसरे अवतार रावण का वध करने हेतु, क्यूंकि रावण को वरदान प्राप्त था, इसलिए इश्वर को अवतरित होना पड़ा |

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क्या है हमारी संस्कृति ? पिछले ५००० वर्षो का इतिहास तो गौरवपूर्ण है नहीं

ध्यान रहे, कुछ बीच के छोटे छोटे समय को छोड़ कर, विकास का लाभ कभी भी , पिछले पांच हज़ार वर्षो में मुख्य समाज तक नहीं पंहुचा |

विकास का लाभ व्यापारियों को था, कर वसूलने वाले ठेकेदारों को था, जमींदारों को था, राजा, रजवाडो को था, उच्च पढ़ पर आसीन धर्मगुरूओ को था| मुख्य समाज का शोषण बहुत अधिक था, चुकी शिक्षा हमारी गुरुकुल थी, जो इस बात को प्रोहित्साहित करती थी|

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विकास और आधुनिकरण एक ही सिक्के के दो पहलू हैं...अलग नहीं हो सकते

भारत मैं आधुनिकरण, और उसके होते हुए, हर परिवारों में नए समीकरण, बिखराव, तथा फैशन को लेकर संस्कृति को सहारा बना कर आलोचना होती है | हर घर मैं बड़े बुजुर्ग, धर्म से जुड़े लोग, तथा जिसे कुछ लेना-देना भी नहीं है धर्म से, वे भी आधुनिकरण को भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बताते हैं |

पह्ले तो यह सोचने की बात है की संस्कृति का अर्थ ‘ठहराव’ नहीं है, संस्कृति सदैव समय, परिस्थिति और विकास के साथ साथ बदलती रहती है | पूरा भारत इस बात को स्वीकार करता है की आधुनिकरण और फैशन तो विकास के साथ साथ आता ही है, लकिन वोह अश्लील नहीं होना चाहीये, तथा परिवार मैं आपसी सहयोग, प्रेम दिखाने का नहीं वास्तविक होना चाहीये |

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क्या कारण है कि श्राप और वरदान सिर्फ गरीबो के कष्ट की कमी के लिए नहीं हैं

पुराण उठा लीजिये, महाभारत या रामायण देख लीजिये; सारे ग्रन्थ ऐसे अनेक प्रसंगों से भरे हुए हैं कि अमुक ऋषि, महाऋषि, मुनि-महामुनि, देवी-देवता, और स्वंम प्रभु ने कुपित होकर यह श्राप दिया, और, प्रसन्न हो कर यह वरदान दिया | तथा ना ही श्राप, और ना ही वरदान कभी मिथ्या होता है |
बहुत सुंदर !
अब प्रश्न ये है कि, मान्यता अनुसार, इश्वर तो दीन, दुखी, निर्धन पर विशेष कृपा रखते हैं, और संचार का पूरा उपयोग, हर सदी हर युग में करके, यह भी बताया गया है कि ऋषि, महाऋषि, मुनि-महामुनि, तो इश्वर से भी अधिक दीन, दुखी, निर्धन पर कृपा रखते हैं; तो फिर किसी ने यह श्राप या वरदान क्यूँ नहीं माँगा, या दिया कि गरीबो का कष्ट कम हो ?

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हमलोग प्राचीन इतिहास शिक्षा लेने के लिए पढ़ते हैं या गुलाम बनने के लिए

पुराण, रामायण और महाभारत प्राचीन इतिहास है, तथा अत्यंत महत्वपूर्ण इतिहासिक ज्ञान है | जहाँ रामायण युगपुरुष श्री विष्णु अवतार श्री राम की गाथा है, और महाभारत, सर्वकला से परिपूर्ण अवतार श्री कृष्ण की गाथा है , पुराण सौर्यमंडल की उत्पत्ति, पृथ्वी की उत्पत्ति, और श्रृष्टि के आरम्भ से आज तक का इतिहास है | 

रामायण और महाभारत अवतरित इश्वर का इतिहास होने के कारण सारे वेदों का ज्ञान और निचोड़ है, क्यूँकी सनातन धर्म ही ने अवतार के इतिहास को दूसरा वेद माना है| इसपर आप चिंतन करेंगे तो पायेंगे सत्य है| और पुराण प्राचीन इतिहास के अतिरिक्त भूमि-विज्ञान(जियोसाइंस) भी है| सारा इतिहास उपलब्ध है संस्कृत में और उसका अनुवाद भी अनेक भाषा में हुआ है; हर प्रान्तिये भाषा में यह उपलब्ध है | 

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वृद्ध लोगो से निवेदन..सनातन का सही अर्थ समझें स्वीकारें और समाज को बताएं

यह एक विचित्र समस्या है, हिन्दुओ के बुजुर्गो में, कि वे सारे निर्णय भावनात्मक बातो पर लेना चाहते हैं, और यह भी एक कारण है समाज का कर्महीन होने का| समस्या बड़ी इसलिए है कि इसका कोइ आसान समाधान है नहीं, समाधान बुजुर्गो को ही निकालना होगा; लेकिन वे किसी की क्यूँ सुनेंगे, क्यूँ स्वीकार करेंगें कि सुधार की आवश्यकता उनमें भी है| कैसे इसका समाधान होना है यह मैं आपसब पर छोडता हूँ|

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गुरुकुल शिक्षा प्रणाली से भारत क्यूँ नष्ट हुआ, गुलाम बना..चर्चा और विचार

यह पोस्ट गुरुकुल शिक्षा प्रणाली के अंदर महाभारत से पहले से जो दोष आ गए, और जो आज तक हैं, उनको ना सुधार कर गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को बिना दोष मुक्त करे अच्छा बताए जाने का विरोध करती है| पोस्ट लिखते हुए अत्यंत कष्ट हो रहा है, क्यूंकि इससे पहले दो पोस्ट शिक्षा पर लिख चूका हूँ, जिसमें भौतिक तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित हो चुका है कि गुरुकुल शिक्षा प्रणाली से भारत नष्ट हुआ, गुलाम बना, लकिन एक ख़ास वर्ग यह अनुभव करने लगता है कि उसको समाज को भौतिक तत्यों से जो सत्य सामने आ रहा है, उसको नक्कारना है, समाज के सामने सत्य को नहीं आने देना है, और यहीं से समस्या बढ़ जाती है ! इस समाज को यह तो समझना होगा कि कोइ भी तथ्य छिपाया नहीं जा सकता , आज सूचना युग है, सबकुछ सामने आएगा ही |


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शनि के प्रकोप से बचने के स्वम निरक्षित सरल उपाय

आपको कुछ ऐसे सरल उपाय बता दें जिसकी प्रमाणिकता की जांच आप स्वम कर सकते हैं, उपाय भी सरल हैं, और आपकी दैनिक दिनचर्या को प्रभावित भी नहीं करेंगे; और विश्वास रखीये, परिणाम का अनुभव आप स्वम करेंगे |

क्यूँकी बात हुई है कि ‘प्रमाणिकता की जांच आप स्वम कर सकते हैं’, तो सबसे पहले शनि को समझ लें |

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भारतीय शिक्षा प्रणाली तथा सामाजिक मूल्यों की शिक्षा मैं आभाव का कारण

भारतीय समाज को यह बताया गया है कि अंग्रेजो के ज़माने मैं एक मेकैउले थे जिन्होंने यह कहा था कि भारत मैं ऐसी शिक्षा प्रणाली पर्याप्त है जो निचले स्तर के सरकारी कर्मचारी उपलब्ध करा सके | जब भी शिक्षा की बात होती है, हम इसी बात को लेकर बैठ जाते है | विश्वास कीजिये  हमारी शिक्षा प्रणाली कोइ बुरी नहीं है, हां सुधार की गुंजाईश उसमें भी है | लकिन वोह सुधार विद्यार्थी को आज के परिपेक्ष मैं रोजगार, और समाज की अवश्यक्ताओ के प्रति अधिक उपयोगी बनाना है | उसके लिए सूचना और आज के उपकरणों की जानकारी और निपुर्नता भी महत्वपूर्ण है | सामाजिक मूल्यों की शिक्षा सदा धर्म से मिली है , और मिलेगी !

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सनातन धर्म को विज्ञान और प्रमाणिकता के आधार पर स्थापित करने का प्रयास

इस पोस्ट पर कुछ भौतिक प्रमाण दिए जायेंगे जो आस्था पर नहीं आधारित हैं, विज्ञान और पृथ्वी के भूगोलिक और खुगोलिक विकास पर आधारित है:

1. कामदेव को पुरस्कृत करते हुए इश्वर शिव का उसको शारीरिक बंधन से मुक्त करना, और द्वापर युग मैं वापस शारीरिक बंधन देना :

नई श्रृष्टि का प्रारंभ सतयुग मैं होता है, और सतयुग के प्रारंभ मैं इश्वर शिव, प्रसन्न मुद्रा मैं, कामदेव को शारीरिक रूपी सीमाओं से मुक्त करदेते हैं, ताकी श्रृष्टि का अभूतपूर्ण विकास हो सके; और ऐसा होता भी है| एनेक विशाल काय जीव पृथ्वी पर उत्पन्न होते हैं, चारो तरफ वन का फैलाव हो जाता है, और उसके प्रमाण भी हैं!

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सनातन धर्म प्राकृतिक विकास पर आस्था रखता है...और विज्ञान भी यही मानता है

पहले तो एक बहुत स्पष्ट बात जो संस्कृत विद्वानों और धर्मगुरुओं को कहनी चाहीये थी, समझानी थी, अपनी लेखनी द्वारा और अपने प्रवचनों द्वारा, लकिन समाज का शोषण हो सके, इसलिए नहीं बताई गयी....कि हमारे इश्वर अन्य धर्मो और मजहबो के इश्वर से कम शक्तिशाली है, जिसका मात्र इतना अर्थ है कि वे किसी तरह का चमत्कार का प्रयोग नहीं करते, मानव की व्यक्तिगत समस्या के समाधान के लिए इश्वर पूर्ण रूप से सहायक है, लकिन समाज, प्रकृति और श्रृष्टि की सहायता वे स्वर्ग मैं बैठ कर नहीं करते, उसके लिए अवतरित होते हैं, और पृथ्वी के नियमो मैं बंध कर प्रयास करते हैं |

सनातन धर्म मात्र एक अकेला ऐसा धर्म है जो की प्राकृतिक विकास पर आस्था रखता है ना की सृजन मैं| 

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महाशिवरात्रि, पर्व जो व्यक्तिगत और सामाजिक लाभ के लिए मनाया जाता है 

महाशिवरात्रि उस पावन पर्व का नाम है जब भगवान शिव शंकर ने माता पार्वती से पाणिग्रहण संस्कार करा था !इस पर्व का महत्त्व इसलिए भी है कि इसमें पूजा करना अत्यंत लाभकारी माना गया है ! अविवाहित कन्या मंगलमय विवाह के लीये, विवाहित दंपत्ति संगतता समस्याओं के समाधान के लीये, तथा अन्य ईश्वर की अनुकंपा के लीये पूजा करते हैं !

अब कुछ चर्चा कर लेते हैं कि महाशिवरात्रि पर्व का व्यक्ति और समाज के संधर्भ मैं उद्देश क्या क्या है, और क्यूँ यह अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है |

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हिन्दू को कर्महीन से कर्मठ बनाना है, काम मुश्किल है, प्रतिबधता चाहीये 

हिन्दू समाज पूरी तरह से दासता के लक्षण दिखा रहा है, उसको मात्र भावनात्मक बात पसंद आती हैं| यदि यह कहा जा रहा है कि श्री राम ने माता सीता के अपहरण की स्वीकृति दी थी, या बाल ब्रह्मचारी हनुमान के एक संतान भी थी, या द्वारिकाधीश श्री कृष्ण ने अपनी सेना युद्ध मैं किसको देनी है, यह निर्णय द्वारिका पर ना छोड़ कर अर्जुन और दुर्योधन पर छोड़ दिया, क्यूँकी युद्ध तो दुर्योधन और अर्जुन मैं हो रहा था, तो देशद्रोह नहीं धर्म है, तो हिन्दू खुश होकर यह कह्गा ‘जी गुरुदेव’ और हमारे संस्कृत विद्वान और धर्मगुरु इस पर अनेक लेख भी लिख देंगे हां इस बात को छिपा जायेंगे की अब हमने समाज को पूरी तरह जिन्दा लाश बना दिया है |

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नरकासुर कौन और क्या है, तथा उसका वध और नरकासुर चौदश कैसे मनाए   

विष्णु अवतार श्री कृष्ण ने अपने जीवन काल मैं अनेक युद्ध देखे और लड़े, और फिर अंत मैं विश्वयुद्ध, जिसको महाभारत भी कहते हैं, लड़ा और जीता | युद्ध मैं कुछ भी नहीं बदला; श्रिष्ट के आरम्भ से आज तक; वही चला आ रहा है, और २१ वी सदी के लोगो को सूचना के कारण बहुत कुछ मालूम है, तथा वर्तमान वर्ष अनेक समाज जो की युद्ध मैं घिर गए, उनके लिए नरक बन कर आया है| 

मुझे लगता है कि आप समझ गए होंगे, तबभी पोस्ट की आवश्यकता हैकी मैं भूमि पर नरक का विवरण यहाँ पर देदूं, हालांकि यह नरक का विवरण जोकी पृथ्वी पर वास्तव मैं असंख्यों बार हुआ है, आपको विचलित कर सकता है, तथा यह भी मन मैं बैठा लें की यह श्रृष्टि के आरम्भ से आज तक.... जी हाँ अभी तक और आगे भी चलता रहेगा !

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एक ऐसा शब्द जिसका पूरा दुरूपयोग हो रहा है, अध्यात्म और अध्यात्मिक   

हिन्दू धर्म मैं यदि कभी कोइ गलती से ऐसा प्रश्न पूछ ले जिसमे धर्मगुरु असमंजस्य मैं आ जाय, उत्तर ना मालूम हो, तो बहुत सहज तरीका है, अध्यात्म की बात शुरू कर दीजिये, बस धर्मगुरु का काम बन जाएगा, प्रश्न पूछने वाला धर्मगुरु महाराज के गूढ़ ज्ञान की तारीफ करेगा, और अपनी कर्महीनता को छिपा कर ध्यान मग्न मुद्रा मैं बार बार सर हिलाएगा, यह बताने के लिए कि अब उसे सब समझ मैं आ रहा है, और धर्मगुरु भी अध्यात्म और अध्यात्मिक शब्द का प्रयोग करके अपने ज्ञान का सिक्का मनवा लेंगे | आप चाहे तो इस फोर्मुले को स्वंम अजमा सकते हैं | धर्मज्ञाता और ज्ञानी बनने और दिखने के लिए ‘अध्यात्म और अध्यात्मिक’ शब्द अति आवश्यक हैं | थोडा सा प्रयास करें, इन शब्दों को सही समय सही प्रयोग आपको आ जाएगा |

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मांग मैं सिन्दूर का कारण प्राचीन चिकित्सा विज्ञान जो आज भी प्रासंगिक है

यदि मांग मैं सिन्दूर सिर्फ पति की लम्बी आयु के लिए लगाया जाता था, तो यह पोस्ट निसंकोच उन महिलाओ के पक्ष मैं होती जो ऐसा नहीं कर रही है; परन्तु चिकित्सा विज्ञान की आवश्यकताएं हैं, और यह पोस्ट सब विवाहित महिलाओ से सिन्दूर लगाने के लिए अनुरोध कर रही है

पुराण, रामायण और महाभारत से दो प्रकार की सूचना हमारे पास आती है, एक कम विकसित समाज के लिए जिसको की भावनात्मक तरीके से स्वास्थ और चिकित्सा सम्बंधित सूचनाएं दे दी जाती है, और दूसरा विकसित समाज के लिए, जिसको अति आवश्यक है विज्ञान और आज की सूचना के आधार पर सब बताया जाय|

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शंकराचार्य और साईं भक्तो के बीच का विवाद निराधार है 

हिन्दू समाज जो की वैसे भी सिमटता और सिकुड़ता जा रहा है, उसको और कमजोर करने की नई साजिश शुरू हो गयी है | साईं पूजा को अधार्मिक बताया जा रहा है, और वोह भी शंकराचार्य द्वारा !

पहले तो यह समझ लें कि यह विवाद गलत मोड़ पर पहुच चूका है| समाज को और विभाजित करने का षड्यंत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं है यह |

साई भक्तो को शुद्धिकरण करना होगा, यह सब बाते निराधार हैं, समाज को कमजोर करके राजनीति से प्ररित यह सब वक्तव्य लगते हैं |

साई भक्ति का विरोध तो इस ब्लॉग ने भी करा था, लकिन उसका कारण था, आजादी के बाद धर्म का बढ़ता हुआ, भावनात्मक भाग, जो की नहीं होना चाहिए; परन्तु इसके लिए सनातन धर्म के धर्मगुरु ही अधिकतर जिम्मेदार है, ना की साई पूजा | हाँ यह आवश्यक है की साई पूजा ने सिर्फ धर्म के भावनात्मक भाग को बढ़ाया है और कोइ योगदान नहीं है, जो नकारात्मक है| लकिन उसके समाधान हैं, और विवाद जिस तरह से गलत मोड़ पर पहुच गया है, समाधान साई भक्तो को ही निकालना होगा | 

सत्य तो यह है की धर्मगुरुओ ने अपनी दुकाने चलाने के लिए धर्म का भावनात्मक भाग आजादी के बाद जबरदस्त बढ़ाया, और इसी कारण साई भक्ती को भी बढ़ावा मिला | तो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से साई भक्ति के लिए सनातन धर्म के धर्मगुरु जिम्मेदार हैं, और इस दुकानदारी मैं  साई-मंदिरों की बढ़ती हुई हिस्सेदारी अब उन्हें रास नहीं आ रही है ; और यही कारण है इस विवाद का |

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कामदेव के भस्म होने का अर्थ…एक विज्ञानिक खुगोलिक दृष्टिकोण  

सनातन धर्म सबसे प्राचीन धर्म है, और चुकी यह वर्तमान समाज केन्द्रित धर्म है, तो इसमें गलत सूचनाओं के कारण स्थिथी कष्टदायक भी हो जाती है| यह भी सत्य है कि सूचना समाज को धर्मगुरुजनों द्वारा प्राय गलत भी मिलती रही है, और इस समय भी ऐसा ही हो रहा है| यह पोस्ट इसलिए आवश्यक हो गयी क्यूंकि यह कुछ ऐसी सूचना है जो विज्ञानिको के पास अवश्य होनी चाहिए ताकी भविष्य के लिए नीती निर्धारित करने मैं सहायता मिले|

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संस्कृत विद्वानों और धर्मगुरुजनों, समाज के पतन का उत्तर तो देना होगा   

संस्कृत विद्वानों तथा धर्मगुरुजानो, हिन्दू समाज सूचना युग मैं है, इसलिए मुश्किल है प्रश्नों का उत्तर न देना | यह इसलिए भी आपसबको समझ लेना चाहिए क्यूँकी आज व्यक्ति की पहुच विश्व-व्यापी है, संचार और सूचना के अनेक सोत्र हैं, इसलिए चर्चा से भागने से कष्ट, संस्कृत से सम्बंधित उन लोगो को भी होगा जो संस्कृत भाषा सीख कर अपनी जीविका चलाना चाहते हैं | 

कृप्या शोषणकर्ताओं  का साथ देना बंद करें और सत्य को छिपाने की कोशिश नहीं करें |सूचना युग मैं यह संभव नहीं हो पायेगा |

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उत्क्रांति मैं आस्था के कारण सनातन धर्म वर्तमान समाज केन्द्रित है   

सनातन धर्म चुकी उत्क्रांति(क्रमांगत उनत्ती, EVOLUTION) मैं आस्था रखता है, तो अन्य धर्मो की तरह यह नियम प्रधान धर्म नहीं है | यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि बाकी सब धर्म/मजहब सर्जन(CREATION) मैं आस्था रखते हैं |

ईश्वर, समाज व श्रृष्टि के किसी भी कार्य मैं हस्ताषेप नहीं करते| अगर किसी समय के, श्रृष्टि विरोधी नकारात्मक मार्ग को बदलना होता है, तो इश्वर अवतार लेते है| सनातन धर्म उत्पत्ति मैं आस्था रखता है |

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मनु स्मृति क्या है तथा स्मृति और धार्मिक ग्रन्थ मैं अंतर   

इस प्रश्न का संतोष-जनक उत्तर अभी तक किसी ने भी नहीं दिया, और उसके कारण भी हैं| सनातन धर्म के एक वर्ग ने मनुस्मृति को बहुत महत्वता दी होई है, जबकी अनेक विशेश्य्ज्ञों का मत है कि क्यूंकि मनुस्मृति जात और जाती समीकरण को बढ़ावा देती है, इसे समाप्त कर देना चाहिए | दूसरा प्रमुख कारण यह भी है कि हिन्दू समाज मैं कोइ केंद्रीय समिति नहीं है, जो महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय ले सके|

क्या है यह मनुस्मृति और यह आई कहाँ से ?

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संस्कृत भाषा से समाज को शोषित करने के प्रमाण   

अब देखीये, और इन विद्वानों से प्रमाण माँगीए की यह कैसे ठगी और शोषण की नियत से गलत सूचना हिन्दू समाज तक पंहुचा रहे हैं | ध्यान रहे संस्कृत का श्लोक कोइ प्रमाण या मानक नहीं होता | फिर से अच्छी तरह समझ लीजिये: संस्कृत का श्लोक कोइ प्रमाण या मानक नहीं होता |  

कलयुग सबसे खराब युग है | 
आपको इस विषय पर श्लोक भी सुना दिया जाएगा कि कैसे कलयुग सबसे खराब युग है, और यह भी आपको समझा दिया जाएगा कि आपके उपर सारी मुसीबत इसी कारण हैं |

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संस्कृत भाषाका दुरूपयोग हिन्दू समाज को शोषित रखने केलिए विद्वान कररहे हैं   

यह बहुत ही गंभीर आरोप है, और इसके बाद इस विषय को गंभीरता से सारे तथ्यों की रोशनी मैं समझना आवश्यक है की कहाँ भटक गए |

विद्वान जिनपर समाज को गर्व करना चाहीये, वोह ऐसा घृणित कार्य कर रहे हैं, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और जिन विद्वानों ने संस्कृत भाषा का दुरूपयोग करके, समाज को शोषण की नियत से गलत दिशा दी, वे अवमानना के अधिकारी हैं |

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संस्कृत भाषा का प्रयोग सनातन धार्मिक कार्यकर्मों मैं बंद होजाना चाहिए 

सनातन धर्मगुरु जनो ने महाभारत पश्च्यात अत्यंत अस्तव्यस्थता के वातावरण मैं हिन्दू समाज को बर्बाद कैसे होने दिया? बीच बीच के कुछ समय को छोड़ कर गौरवपूर्ण इतिहास पिछले ५००० वर्ष मैं हिन्दू समाज का नहीं रहा है| पूरे विश्व मैं एक मात्र समाज होने के बाद, धीरे धीरे नए धर्म/मजहब आते चले गए, और हिन्दू समाज सिकुड़ता चला गया

क्या संस्कृत भाषा का दुरूपयोग हुआ है?

क्या संस्कृत का उपयोग समाज के शोषण और गुलाम बना कर रखने के लिए करा गया है?

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युगों को परिभाषित करने केलिए राहू केतु आवश्यक खगोलिक बिंदु  

अब क्या यह युगों को परिभाषित करने के लिए खोगोलिक बिंदु हैं?

राहू और केतु की मृत्य , अर्थात चन्द्र का सूर्य के सन्दर्भ मैं धुरी न बदलने पर समुन्द्र स्थिर हो जाएगा, 
और कलयुग और सतयुग के बीच का अंतराल, जिसमें पृथ्वी जलमग्न रहती है !

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सनातन धर्म समझना आसान है और पालन करना और भी सरल   

‘सनातन धर्म समझना इतना आसान नहीं है, मन को एकाग्रित करके ही आप उसको समझने का प्रयास कर सकते हैं, वोह भी अगर आपके गुरु मैं इतनी क्षमता होगी तो’; यह आपने अनेक स्वरों मैं सुना होगा, दूसरी बात; कि सनातन धर्म को समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान अति आवश्यक है |

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छात्रों और युवाओं से हिन्दू समाज को कर्मठ बनाने हेतु श्रमदान

पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने काशी हिन्दू विश्विध्यालय का निर्माण करवाया था, और वोह भी सिर्फ दान के पैसो से| बहुत बड़ा संकल्प था उनका, और जिन लोगो ने यह विश्विध्यालय देखी है, वे जानते है कि यह कार्य अभूतपूर्ण था, जो एक महान व्यक्ती ही सोच सकता है, और पूरा कर सकता है|

अंग्रेजो का राज्य था, और ईसाई समाज का बोलबाला था, तो हिन्दू विश्विध्यालय का सपना उनका बहुत लोगो को मात्र सपना ही लगा, और वोह भी बिना किसी सरकारी सहायता के, मात्र दान के पैसे से| 

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करवा चौथ ~~~KARVA CHAUTH
एक ऐसा पर्व जो की गुलामी की सोच को दर्शाता है, 
की मर्द को जिन्दा रहने के लिए पत्नी को कठोर व्रत कर के ईश्वर को खुश करना होगा |

इस हिन्दू समाज को तो दुबारा गुलाम होना ही चाहिए !

करवा चौथ, REMINDER OF AGE WHEN WIDOWS WERE BURNT ALIVE ON HUSBANDS FUNERAL

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हिन्दू समाज जागो..क्या सोते सोते ही दुबारा गुलामी की और बढ़ जाना हैं?

सनातन धर्म क्यूँकी नियमो से बंधा धर्म नहीं है, तो उसमें व्यापक लचीलापन है, और समाज की स्तिथि के अनुसार उस लचीलेपन का प्रयोग समाज सुधार और/या  समाज की उनत्ती के लिए होता है | हर धार्मिक प्रवचन/शिक्षा मैं एक उचित अनुपात भावना और कर्म का होना जरुरी है, यह अनुपात समाज की वर्तमान वास्तविक स्थिथि पर निर्भर करती है|

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ईश्वर स्वर्ग मैं बैठकर बिना अवतार लिए हिन्दू समाज की मदद नहीं कर सकते

कृपया ध्यान से सुने :
९८% लोग भ्रष्ट नहीं है, और मात्र २% लोग भ्रष्ट हैं, और वोह भी जनता के सामने भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए दोहाई देते हैं | 

फिर भगवान् हमारी सहायता क्यूँ नहीं कर रहा है , हमको तो यह बताया गया है ईश्वर सत्य और सही के सदैव साथ रहता है |

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स्वर्ग, नर्क, देवता, राक्षस पर विचार और परिभाषा  

जिस तरह से असुर-राज पताल मैं हैं उसी तरह से देवता तताकथित स्वर्ग मैं रहते हैं जो पृथ्वी लोक से बाहर है| यह विज्ञान की दृष्टि से भी आवश्यक जानकारी है, कि पृथ्वी मैं जो भी जीवन, या श्रृष्टि है, उसके लिए पृथ्वी का सौय्रमंडल और ब्रह्माण्ड से सामंजस्य मुख्य कारण है, चुकी पृथ्वी अपने आप मैं असमर्थ है; असुरो का निवास है|

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लचीलापन, समाज की रक्षा की प्रतिबद्धता ने सनातन धर्म को अमर बना दिया  

सनातन धर्म मैं अवतार का स्वरुप, अशिक्षित समाज के लिए, अलोकिक शक्ती की चादर के साथ होता था; विकसित, शिक्षित समाज मैं, बिना अलोकिक, चमत्कारिक शक्ती के, जैसा की आजादी के बाद होना था, परन्तु नहीं हुआ

क्या है लचीलापन सनातन धर्म मैं, आज तक किसी गुरु ने इसके बारे मैं कुछ क्यूँ नहीं बताया? आप किसी भी प्रवचन मैं चले जाईए, आपको यह बताया जातेगा की सनातन धर्म पूर्णता का प्रतीक है, और इसी लिए यह अमर है| जबकी यह गलत है| सत्य यह है कि सनातन धर्म अस्तव्यस्तता मैं विश्वास रखता है, पूर्णता मैं कदापि नहीं| 

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सनातन धर्म पूर्णता मैं नहीं अस्तव्यस्तता मैं विशवास करता है   

‘पूर्णता क्षणिक और अस्तव्यस्तता अनन्त है’, और हिंदू अस्तव्यस्तता मैं ही विश्वास रखते हैं, और यह भी एक कारण है सनातन धर्म के अनन्तता का| धर्म के परिपेक्ष मैं क्या अंतर है पूर्णता मैं और अस्तव्यस्तता मैं? पूर्णता आपको बाकी सब धर्म/रिलिजन/मजहब मैं देखने को मिल जायेगी, और सनातन को छोड़ कर, बाकी सब नियम प्रधान धर्म होते हैं, जिसको मानना अनिवार्य है| इन नियमो मैं समाज की बदलती हुई स्तिथी मैं छोटे मोटे बदलाव भी कष्टदायक हो जाते हैं| कुछ उद्धरण बात समझने के लिए उपयुक्त रहेंगे :

पहले समाज राज्य प्रधान था, यानी की राज्यों की सीमाए बदलती रहती थी, और उन्ही का आदर करता था| राष्ट्रीयता क्या है उससे किसी को मतलब नहीं था| इस युग मैं चाणक्य ने २३०० वर्ष पूर्व भारत मैं राष्ट्रीयता का नारा बुलंद करा, और क्यूँकी सनातन धर्म वर्तमान समाज को केंद्र बिंदु मान कर चलता है, तो किसी ने उसका विशेष विरोध नहीं करा| 

और 

अब यूरोप मैं देखीये; जॉन ऑफ आर्क, एक १९ वर्ष की कन्या ने फ्रांस मैं राष्ट्रीयता का नारा लगाया तो इसाई पादरियों ने उसे जिन्दा जलाने का आदेश दे दिया, और जिन्दा जला भी डाला| वोह सत्य है की बाद मैं उसे संत की उपाधी भी दी, लकिन उद्धारण का कारण यह है घोर कष्ट के बाद बदलाव आया|

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क्या प्राचीन युगों मैं अस्त्र-शस्त्र सिद्ध मन्त्र से संचालित होते थे ?  

‘रावण ने माया रची', प्राचीन युगों मैं अस्त्र-शास्त्र का सिद्ध मन्त्र से संचालन, अन्य लंबी दूरीके ध्वनिक यंत्र, अब आम बात है, और अज्ञान के कारण धर्मगुरु इसे समाज को समझा नहीं पारहे हैं~~रामायण और महाभारत, को बिना अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति के समझना अनिवार्य है, ताकि हिंदू छात्रों को प्राचीन विज्ञान की जानकारी मिले, शोघ के लिए ज्ञान मिले, और हिंदू समाज विश्व मै उचित प्रतिष्ठा पा सके

आवाज का अपना ही विज्ञानिक महत्त्व है; तथा आपकी आवाज अद्वित्तीय है|  हर व्यक्ति की आवाज़ मैं एक निश्चित और अलग अंदाज़ से आवृति(FREQUENCY) और पिच(PITCH) होती है, जो की शब्दों के साथ साथ बदलती है, और इन सब कारणों से वोह अद्वित्य हो जाती है| पुरानो मैं, प्राचीन समय मैं मन्त्र सिद्ध अस्त्र-शास्त्र का उल्लेख है; परन्तु चमत्कारिक और अलोकिक शक्ति की चादर के कारण हम उसको समझ नहीं पा रहे है, और इसी मिथ्या की चादर के कारण, जो की धर्मगुरु उतारना नहीं चाहते, युवा हिंदू छात्र न तो प्राचीन शास्त्रों मैं दिलचस्पी ले रहे हैं, और ना ही उसपर आगे शोघ कर पा रहे हैं| यह अत्यंत खेद का विषय है|

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आजादी के बाद के कर्महीन हिंदू समाज की मानसिकता कैसे बदली जाए ? 

अवतार का स्वरुप, अशिक्षित, कम विकसित समाज केलिए, अलोकिक शक्ती की चादर के साथ होता है, और आजादी सेपहले था और विकसित, शिक्षित समाज के लिए, बिना अलोकिक शक्ती के, जो आजादी केबाद होना था, परन्तु नहीं हुआ

सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि हिंदू समाज कर्महीन क्यूँ है? यदि इतिहास उठा कर देखे तो हिंदू समाज पिछले २००० वर्ष मैं, कभी भी अच्छे समय से नहीं गुजरा| छोटे छोटे राज्य थे, कुछ अच्छे, कुछ बुरे, और कुछ बहुत बुरे| धर्म ने कभी भी राष्ट्रीयता का आवाहन नहीं करा, और राष्ट्र और राष्ट्रीयता क्या है कभी भी किसी राजा ने, न धर्मगुरु ने समझाने का प्रयत्न नहीं करा| चाणक्य का प्रयास अंतिम प्रयास था, राष्ट्रीयता को समझने का और समझानेका जो की इसा-पूर्व सन ३०० मैं समाप्त हो गया|

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हिंदू समाज मैं जाति समीकरण सतयुग से ही प्रारंभ था   

कठोर परिस्थीतिओं और सामाजिक न्याय के नियमों में अंतर होताहै; समुन्द्र में रहते होए लोग अपराध करते पकडे जाते, उनसे दंड स्वरुप वोह कार्य करवाया जाता जो कोइ नहीं करता था| यहीं से जाति प्रथा आरम्भ होई
कलयुग के अंत मैं मानव द्वारा संसाधन का अंधाधुन्द, अविचारपूर्ण, और विवेकहीन उपयोग से ऐसा समय आएगा, जब पृथ्वी धीरे धीरे जलमग्न होने लगेगी| इसमें कुछ प्राकृतिक विपदा भी सहायक होंगी| 

उस समय पूरे विश्व से, जिनकी क्षमता है, या जो पानी के जहाज के मालिकों के नज़दीक है, या सत्ता के नज़दीक हैं, यह सोच कर की कुछ समय की समस्या है, पानी के जहाज़ मैं सुरक्षा हेतु चले जायेंगे| 

लकिन उन्हे यह नहीं मालूम होगा की यह इस महायुग और अगले महायुग के अंतराल का संधिकाल है, जो की लाखों वर्ष का है, और अब वे, और उनके अनेक, अनेक पीढ़ी, समुन्द्र मैं सतयुग की प्रतीक्षा करेंगे| 

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हिंदू ज्ञान के अनुसार युगों का निर्माण आप कैसे करेंगे  


HOW TO CONSTRUCT YUGS AS PER HINDU GYAN
युगों का निर्माण आप स्वंम  इसलिए करें , ताकी आपको यह सच तो पता पड़े कि कौन सा युग मानवता के लिए अच्छा है और कौन सा मानवता के लिए खराब| अभी तक तो आपको जो बता दिया गया है , वह आपने मान लिया कि सतयुग सबसे अच्छा युग था, और कलयुग सबसे खराब, जब की सच्चाई यह है कि सतयुग सबसे खराब युग था , और कलयुग सबसे अच्छा| आज के सूचना युग मैं यह सहज भी है , तो कमसे कम खुद तसल्ली तो कर लीजीये कि सही क्या है |

ध्यान रखीये यहाँ आप वही ज्ञान इस्तेमाल करेंगे जो सनातन धर्म मैं बताया गया है , और वैसे भी हिंदू धर्म के बाहर कोइ युगों को मानता नहीं है , और चुकी हमारे धर्म गुरुजनो ने केवल हिंदू समाज को ठगने के लिए युगों का प्रयोग करा है , और युगों को भौतिक आधार पर आज तक परिभाषित तक नहीं करा है , इसलिए आपसब के प्रयास के बिना हिंदू धर्म के बाहर लोग इसे मानेंगे भी नहीं |

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एक सन्देश ..क्यूँ पालन कारक स्वरुप इश्वर का अवतरित होता है   


WHY ONLY LORD VISHNU COMES AS AVATAR TO MAKE CORRECTIONS.

यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे मैं पता तो सबको है , लकिन ऐसा क्यूँ इसके बारे मैं कभी किसी ने गंभीरता से सोचने का प्रयास नहीं करा |

नई श्रृष्टि का आरम्भ होता है सतयुग से, और चुकी सतयुग मैं पुरानी श्रृष्टि के कुछ लोग भी आ जाते हैं , मनु के साथ , तो सतयुग मैं नई श्रृष्ट के साथ साथ पुराने युग के मनुष्य, जिनमें राक्षस , अथार्थ मनुष्य का मॉस खाने वाले . और आर्य(आर्य वास्तव मैं राक्षस शब्द के रा को उल्टा कर के बनाया गया है , चुकी राक्षस की प्रवति आम मनुष्य से उलटी थी) भी सम्मलित हैं| आर्य और राक्षस के सतयुग मैं मौजूद होने से श्रृष्टि को लाभ भी होता है और हानि भी| पढीये : कलयुग का अंत..एक नए कल्प का प्रारम्भ और मत्स्य अवतार

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धर्मगुरु समाज को राक्षस और असुर कि भिन्नता की सूचना तो दें   

PLEASE INFORM SOCIETY THAT RAKSHAS AND ASUR ARE DIFFERENT 
इक्कीसवी सदी सूचना युग कहलाती है , और सूचने के अनेक सोत्र उपलब्ध हैं |

यह पोस्ट इसलिए जरूरी हो गयी कि बहुत से लोग यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि यदि यह सत्य है तो यह सूचना हमें गुरुजनों से क्यूँ नहीं मिली | सारी प्रतिक्रिया तब शुरू होई जब इस विषय मैं एक पोस्ट ब्लॉग मैं आई ; लीजिए लिंक पर जा कर आप भी पढ़ें : धर्मगुरु समाज को यह तो बताओ कि राक्षस और असुर अलग हैं

एक प्रमुख कारण हमारी कर्महीन मानसिकता का यह भी है , कि हमारे धर्म गुरु, धन और शोषण के उद्देश हेतु, समाज तक सही सूचना नहीं पहुचने देते हैं | गुरुजानो का कम ज्ञान भी एक कारण है , की गलत सूचना समाज तक पहुच रही है |

कम ज्ञान के कारण या शोषण हेतु , यह गलत सूचना हिंदू समाज को पहुचाई जा रही है , कि राक्षस और असुर एक हैं | नहीं राक्षस और असुर दोनों भिन्न हैं , और जहाँ राक्षस उन मानव को कहते हैं जो की मनुष्य का मॉस खाने लगे थे, असुर प्रकृति मैं सामंजस्य की विपरीत स्थिति को कहते हैं | फिर से बता रहा हूँ : > “असुर, प्रकृति मैं सामंजस्य की विपरीत स्थिति को कहते हैं” |

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धर्मगुरु समाज को यह तो बताओ कि राक्षस और असुर अलग हैं   


HINDU RELIGIOUS LEADERS MUST TELL THE SOCIETY THAT RAKSHAS AND ASURS ARE DIFFERENT 

आज का युग सूचना युग है | इन्टरनेट और कंप्यूटर के कारण सूचना हर विषय मैं सुलभता से उप्लभ्द है | आज धर्म गुरुजनों का यह प्रथम कर्तव्य है कि समाज को अधिक से अधिक सूचना उप्लभ्द कराएं | खेद की ऐसा हो नहीं रहा है ; और यह भी प्रमुख कारण है हिंदू समाज के कर्महीन होने के |

पुरानो मैं राक्षस और असुर दो का रह रह कर वर्णन है , परन्तु सूचना और परिभाषा के अभाव मैं दोनों को एक मान लिया गया है | साम्यता , सामंजस्य , सुर जो की किसी भी परिस्थिति  को पूर्णता की और ले जाता है , उसीके विपरीत शब्द हैं असाम्यता , असामंजस्य और असुर जो की किसी भी परिस्थिति को अराजकता की और ले जाते हैं | विज्ञान से जुड़े बुद्धीजन आपको यह बता सकेंगे की सुर और असुर दोनों की आवश्यकता होती है , किसी तरह के विकास के लिए; यहाँ तक की एक बच्चे को गर्भ मैं स्तापित होने से पैदा होने तक भी दोनों सुर और असुर का सही मिश्रण आवश्यक है |

सुर और असुर , साम्यता , असाम्यता, तथा सामंजस्य और असामंजस्य से ही श्रृष्टि का विकास होता है , और जब भी इसमें गडबडी होती है तो प्राकृतिक विपदा के रूप मैं यह तुरंत प्रकट हो जाती है , और नया संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है | इसी लिए यह कहावत प्रसिद्ध है कि PERFECTION IS MOMENTARY AND CHAOS ETERNAL , अथार्थ ‘पूर्णता क्षणिक और अराजकता अनन्त है’ |

स्पष्ट है कि राक्षस और असुर , दोनों अलग हैं | जहाँ राक्षस उन मनुष्यों को कहा जाता है , जो कि मनुष्य का मॉस खाने लगते हैं , वहाँ असुर प्रकृति मैं उत्पन्न होई अधिक असाम्यता और  असामंजस्य स्थिति को कहते हैं | प्रश्न फिर यह उठता है कि हमारे पुरानो मैं उनको मनुष्य शरीर क्यूँ दे दिया गया है ? 

इसका उत्तर भी स्पष्ट है ; पुराण कुछ विशेष लक्षण , विशेषताओं को दर्शाने के लिए पर्वतो को , नक्षत्रों को , नदियों को, तथा असुरों को शरीर दे कर व्याख्या करते हैं | लकिन इसका अर्थ यह तो नहीं हुआ कि यह सब मनुष्य हैं ? यह कार्य तो धर्म गुरुओं का है कि समाज को उनकी शमता, और सूचना ग्रहण करने की योगता अनुसार समझाया जाए |अफ़सोस , धर्म गुरुजनों की योगता पर ही प्रश्न चिन्ह है | ऐसे मैं समाज की प्रगति कैसे होगी ?

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हिंदू समाज जब सशक्त होगा जब भारत का नेतृत्व एक हिंदू कर रहा होगा 

नेतृत्व के लिए संकल्प और प्रतिबधता अति आवश्यक है, जो की अब तक दिखाई नहीं दिया है |

आप मैं से काफी लोगो ने इस ब्लॉग की पोस्ट पढ़ी होंगी, जो की बर्तमान सोच को चुनौती दे रही हैं, लकिन किसी ने उसे समझने का प्रयास नहीं करा | जबकी वह एक PROFESSIONAL प्रयास है , कर्महीन हिंदू समाज को कर्मठ बनाने के लिए, और रिजल्ट भी GUARANTEED है |

यह जरूरी नहीं है की आप उस विचार धरा से सहमत हो , लकिन यह अति आवश्यक है की आप अपने विचार खुल कर व्यक्त करें , और चर्चा करें ...वही सकारात्मक तरीका है आगे बढ़ने का , और शिक्षित होने का अपना दाइत्व निभाने का | लकिन ऐसा नहीं हो रहा है |

हो सके तो इस दीपावली पर कुछ समाज हित मैं संकल्प लें !!! चुकी अब तक जो कुछ भी आपको धर्म के बारे मैं समझाया गया है , उसमे कुछ गलत भी है |

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हमें भक्त नहीं कर्मठ हिंदू समाज चाहिए 

ARE WE MAKING ANY EFFORTS TO REVIVE HINDU SAMAAJ ...>>..OR...>>
IS HINDU SAMAAJ COMPLETELY IN THE HANDS OF EXPLOITERS WHO ARE ONLY TRYING TO MAKE HINDU SAMAAJ MORE PASSIVE AND TAKE IT TOWARDS ANOTHER SLAVERY?

यदि आप हिंदू समाज को सशक्त देखना चाहते हैं , तो बहुत सीमित विकल्प हैं; इसलिए समय क्यूँ लग रहा है , समझ मैं नहीं आ रहा है ?

पहला कदम यह सोच बनाने से शुरू होगा कि हिंदू धर्म का पहला, महत्वपूर्ण तथा पूरी तरह से अविवादित उद्देश, हिंदू समाज कि प्रमाणित आकडो के अंतर्गत उनत्ति है |

REPEAT > फिर से कह रहा हूँ >> हिंदू समाज कि प्रमाणित आकडो के अंतर्गत उनत्ति है ............यह हमारा पहला और परम उद्देश है |

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मैं और मेरी संतान..चुकी हर व्यक्ति इश्वर का अंश व प्रतिबिम्ब है

I CAN DISCHARGE MY OBLIGATIONS AS FATHER ONLY BY HONESTLY BEING AN AGENT OF GOD 

सृजन इश्वर का कार्य है , न की मनुष्य का | आपकी संतान आपको इश्वर की देंन है | उसका पोषण पूर्णता तभी संभव है जब आप इस विश्वास को धर करलें कि पोषण इश्वर का कार्य है , और मैं, इश्वर का, इस कार्य मैं ,  प्रतिनिधित्व कर रहा हूँ | 

आरम्भ मैं संतान को विशेष देख रेख की आवश्यकता होती है , जो कि आप और आपका परिवार खुशी खुशी पूरा करता है | उसके रोने का अर्थ होता है कि वोह तो कुछ बता नहीं पाता, इसलिए आप स्वंम ही समझने का प्रयास करते हो कि उसकी क्या आवश्यकता है , या कष्ट है , तथा अपनी समझ से उसका निवारण करते हो |

अब बालक ६-८ महीने का हो गया, और आप और आपका परिवार उसके भावों को कुछ कुछ समझने लगे हैं , आज भी वोह कुछ कह नहीं पाता , इसलिए उसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है |

अब बालक कुछ और बड़ा हो गया ; ठुमक ठुमक के चलने लगा | पोषण की मांग है कि उसे कुछ खतरों से सावधान कर दिया जाए , और वोह आप करते हैं | आग और चूल्हे के पास वोह न जाए , इसका ध्यान रखा जाता है , उसे समझाया भी जाता ही कि उसे ऐसा नहीं करना है , और जरुरत पड़े तो झूट मूढ का नाटक भी करना होता है, उसे डाटने का |

बालक भी अब कुछ समझदार हो चला है | अपनी जिद वोह माता से मनवा लेता है और समस्या अपने पिता से | यदि कोइ खिलौना उसका खराब हो जाए तो उसे विश्वास है कि उसके पिता उसे ठीक कर देंगे , या कुछ नया दे देंगे,  और अब तक ऐसा हुआ भी| इस बालक को यह विश्वास हो चला है कि उसकी हर समस्या का समाधान उसके पिता के पास है , परन्तु आज जब खिलौना टूट गया और वह अपने पिता के पास उसे ठीक कराने के लिए पंहुचा , तो पिता समझ गए कि यह ठीक नहीं हो सकता , और उसका ध्यान बाटने के लिए उसे कुछ नए काम मैं उलझाने से ज्यादा जरूरी था उसे बताना कि उसके पिता वास्तव मैं उसकी सारी समस्या का समाधान नहीं कर सकते | “यह खराब हो गया है , अब ठीक नहीं होगा “ , उसके पिता ने बताया | बालक रोया , और पिता ने उसे रोने दिया | उसे आज पहली बार अहसास हुआ कि उसके पिता उसकी सारी समस्या का समाधान नहीं कर सकते |

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सोचिये समझिये और समाज मैं जागरूकता लाईये    

READ THINK UNDERSTAND AND WORK FOR CORRECTION IN HINDU SOCIETY 

1. सबसे सरल परिभाषा धर्म की यह है कि :
धर्मपुस्तकों से प्ररित हो कर धर्मगुरु द्वारा वर्तमान समाज के लिए बनाए गए नियम, जिनका पालन करने से व्यक्ति और समाज प्रगति कि और अग्रसर होता है , पनपता है, तथा इश्वर पर आस्था बनी रहती है |

2. रामायण तथा प्राचीन हिंदू इतिहास भक्ति भाव मैं इसलिए उपलब्ध है क्यूँकी बीते हुए वक्त मैं हिंदू समाज अनेक कठिन परिस्थितियों से गुजरा है, और तब वास्तविक धर्म का पालन संभव नहीं था, तब धर्म को मानने वाले हिंदू समाज की पतन से रक्षा ज्यादा आवश्यक थी, लकिन आज क्या हो रहा है, आज धर्म पालन से समाज प्रगति कि और क्यूँ नहीं अग्रसर है ? 

कृप्या यह गलत जवाब न दें कि समाज धर्म का पालन नहीं कर रहा है | प्रमाणित आकडे बताते हैं कि हिंदू समाज का धार्मिक कार्य मैं व्यय आजादी के बाद बढा है , और अनेक टीवी चैनल(MULTIPLE TV CHANNELS) के आने के बाद तो बहुत तेज़ी से बढा है |

3. पिछले १५०० वर्षों मैं उत्पीडन ,  हिंदू समाज के शासकों द्वारा शोषण के कारण, हिंदू समाज अपने को समेट कर अंदर की तरफ सुकुड गया है , फिर और ज्यादा उत्पीडन, शोषण, तथा और ज्यादा सिमटना और सुकुड़ना, तथा यह क्रम अनेक बार हुआ, जिसका परिणाम है हिंदू समाज पूरी तरह से कर्महीन हो गया है , और आजाद हिन्दुस्तान के धर्म गुरुजनों का यह कर्तव्य है कि इस विचारधारा को बदलें |

4. समझने की बात यह है कि सनातन धर्म कि माने तो अपने लोक मैं बैठे इश्वर कभी भी इस कार्मिक संसार मैं हस्ताषेप नहीं करते | जब इश्वर को हस्ताषेप करना होता है तो वे पृथ्वी पर अवतरित होते हैं , और तब आवश्यक सुधार या दिशा परिवर्तन करते हैं | स्पष्ट है कि अवतरित होने के उपरान्त इश्वर आलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं का प्रयोग नहीं करते ; क्यूंकि इश्वर तो सर्वशक्तिमान है , आलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं का प्रयोग तो वे अपने लोक मैं बैठ कर भी कर सकते हैं , वे अवतार के रूप मैं पृथ्वी पर क्यूँ आयेंगे ?

5. धर्म का सीधा सम्बन्ध समाज से होता है | प्रमाणित आकडे बता रहे हैं कि हिंदू समाज गरीबी और बर्बादी की और बढ़ रहा है , जब की धर्म गुरु जानो कि आर्थिक स्थिति मैं जबरदस्त सुधार हुआ है | सीधा अर्थ है समाज का शोषण हो रहा है | फैसला आप करें कि वास्तिवकता क्या है |

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अवतार की परिभाषा    

“अवतार , या तो दर्शाते हैं , या उपलब्ध कराते हैं,  ऐसी परिस्थिती जिसमें मानव के जीवित रहने मैं उल्लेखनीय सुधार हो | मनुष्य रूप मैं अवतार अवतरित हो कर आवश्यक सुधार मानवता की प्रगति के लिए लाते हैं , जब , जब की मानवता अत्यंत संकट मैं हो | और भौतिक प्रयास समाज की प्रगति के लिए जो करा जाता है , वह धर्म है”
EVOLUTION REQUIRES AVATAR NOT GOD TO MAKE CORRECTIONS 

अवतार का क्या सही अर्थ है, यह जानना अत्यंत आवश्यक है , क्यूंकि सूचना युग मैं हिंदू समाज को अगर आगे आना है , तो परिभाषा तो सबकी सही होनी चाहिए , और परिभाषा भी ऐसी, जो सम्बंधित समस्त प्रश्नों का भौतिक स्तर पर उत्तर दे सके | ध्यान रहे भौतिक स्तर पर , न की भावनात्मक स्तर पर | खेद का विषय यह है कि अभी तक अवतार कि कोइ परिभाषा ही नहीं है |

समस्या यह भी है कि हमारे धार्मिक ग्रन्थ इतने अधिक हैं , कि उनका उपयोग समाज के शोषण के लिए करना ज्यादा लुभावना है, और वही हो रहा है | यदि , स्पष्टीकरण हर विषय पर , समाज को केन्द्र बिंदु मान कर करा गया , तो शोषण समाप्त हो जाएगा , और यह धर्म गुरु नहीं चाहते |

एक उद्धरण उपयुक्त रहेगा | मत्स्य अवतार का उल्लेख है , जो कलयुग के अंत में , जब पृथ्वी पूरी तरह जलमग्न हो जाती है , तो इस युग के कुछ लोगो को, अगले महायुग मैं ले जाने मैं सहायक सिद्ध होता है | पुरानो की माने तो ‘अंतराल’ अथार्थ बीच का समय , यानी की वर्तमान कलयुग का अंत और नए महायुग के शुरुआत की दूरी ७,२०,००० वर्ष की है | इतने लंबे समय मैं , जब पृथ्वी जल-मग्न हो, तो भोजन का अभाव और समुन्द्र पर रहने की क्या अवश्यकताएँ हो सकती हैं , कोइ नहीं बताता, लकिन अनुमान हर व्यक्ति लगा सकता है | समुन्द्र का जल भी स्थिर था , तथा जल-जीवन भी समाप्त हो गया था | केवल भारत , जो जलमग्न था, उसके ऊपर जल मैं कुछ जीवन शेष था, और मछलियाँ दिखाई देती थी | अब परिभाषा , ‘मत्स्य अवतार’ की आप स्वंम निर्धारित करें , भावनात्मक परिभाषा चाहिए, जिससे कर्महीनता बढ़ेगी, या भौतिक, जिससे कर्महीनता कम होगी |अधिक जानकारी के लिए पढ़ें : कलयुग का अंत..एक नए कल्प का प्रारम्भ और मत्स्य अवतार http://awara32.blogspot.com/2011/12/blog-post_23.html

अब सोचना आपको है की इस अंतराल के लिए मत्स्य को अवतार क्यूँ कहा गया , उसका भौतिक या भावनात्मक उत्तर आप देंगे; मैं यह पाठकों पर छोड़ता हूँ | परन्तु एक बात तो आप सब समझ लीजिए, धर्म समाज की प्रगति के लिए करा हुआ कर्म है| आप भौतिक परिस्थितियों से किस तरह से , समाज कि प्रगति के लिए , निबटते हैं , वही धर्म है |

युगों को परिभाषित करने के लिए भौतिक मापदंड चाहिए, जो कहीं पुस्तकों मैं लुप्त पड़े हैं , लकिन समाज चुकी कर्महीन है , इसलिए धर्म गुरु बिना उसके भी काम चला रहे हैं |

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पाखंडी बाबा पर अंकुश लगाईये

STOP EXPLOITATION OF HINDU SAMAAJ FROM FRAUDULENT BABAS 
आज कल एक पाखंडी बाबा की ठगाई के चर्चे हर जगह हो रही हैं !

लोग पाखंडी बाबा की ठगाई की बात तो करते हैं , लकिन केवल अपनी भावना व्यक्त करने के लिए |

जब बाबा ठगाई के लिए टी वी को माध्यम चुन रहे हैं , उसके खिलाफ कुछ भी कैसे साबित कर पायेंगे ?

सनातन धर्म मैं ऐसे लोगो पर अंकुश कैसे लगाना है, साफ़ बताया है , प्रयास क्यूँ नहीं करा जा रहा,  यह आप बताएं?

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सत्यम शिवम सुन्दरम से अपने जीवन को समझीये 

अब हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि हम अपना जीवन सत्यम शिवम सुन्दरम से और मधुर कैसे बना सकते हैं ! जीवन की गुणवत्ता हर हिंदू के लिया महत्व रखती है, और विशेष बात यह है कि कलयुग मैं यह भौतिक है, आद्यात्मिक नहीं !

आगे बढ़ने से पहले कुछ चर्चा जीवन की गुणवत्ता पर कर ले ! इस शब्दावली को आज का संसार समझ नहीं पा रहा है ! विज्ञान अभी तक भौतिक मापदंड निर्धारित नहीं कर पारहा है कि जीवन की गुणवत्ता क्या होनी चाहिये !इसे समझने के लिये आज के कुछ मानकों पर विचार करते हैं ! विज्ञान कि प्रगत्ति ने जीवन मैं अनेक सुधार करें हैं , यह प्रमाणित सत्य है ! यदी हरेक छेत्र को अलग अलग देखा जाय तो हम पाएंगे कि सब छेत्र मैं सुधार हैं ! स्वास्थ, संचार, परिवहन, मैं विशेष प्रगति है !निजी आराम और उपयोगिताओं, मनोरंजन, बुनियादी ढांचे, मैं भी प्रगति है !

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सत्यम शिवम सुन्दरम का सरल अर्थ   

सत्यम शिवम सुन्दरम भगवान शिव के वर्णण करने का एक तरीका है ! परन्तु इसका यदी अर्थ समझ लिया जाय तो व्यक्ती अपने जीवन को सुंदर, पृथ्वी और ब्रह्मांड के अनुकूल बना सकता है ! आपका जीवन मधुर और सार्थक हो जायेगा ! इस पोस्ट को लिखते समय इस बात का ध्यान रखा गया है कि सब कुछ सरल भाषा मैं हो!

हिंदू मान्यता के अनुसार, विश्व का कार्य तीन भागो मैं है, जो इस प्रकार है :
1. श्रृष्टि रचेता: चुकी श्रृष्टि की रचना अत्यंत जटिल कार्य है, ब्रह्मा जी ब्रम्ह्लोक से उसका मार्गदर्शन करते हैं ! ब्रम्ह्लोक या गृह ब्रम्ह्लोक कहाँ है यह किसी को पता नहीं, पृथ्वी पर तो यह नही है; अतः वैज्ञानिक दृष्टि से श्रृष्टि की रचना पूर्णत: पृथ्वी सम्बंधित नहीं है ! कुछ मानक पृथ्वी से बाहर हैं, जिनका प्रभाव पड़ता है !
2. पालनकर्ता : भगवन विष्णु श्रृष्टि का पालन करते है! उनका निवास विष्णुलोक, या वैकुण्ठ है ! यह भी पृथ्वी पर नहीं है! अतः कुछ मानक पृथ्वी से बाहर हैं, जिनका प्रभाव पड़ता है !
3. संघारकर्ता : भगवन शिव इस की जिम्मेदारी लेते है ! उनका निवास स्थान हिमालय है! अतः संघार के समस्त मानक पृथ्वी पर है; कोइ भी मानक बाहर नहीं है !

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धार्मिक आद्यात्मिक साधू तथा गुरु की परिभाषा  

हिंदू धर्म मैं यह परेशानी इस लिये भी है की धर्म शब्द के दो अलग अर्थ और प्रयोग हैं | एक तो सनातन धर्म या HINDU RELIGION जो की इस बात की जानकारी देता है की सनातन धर्म क्या है और कौन उसमें आतें हैं ! दूसरा धर्म का अर्थ है भौतिक तरीके से अपनी समाज मैं जिम्मेदारियों को निभाना ! यही दूसरा धर्म स्वर्ग की सीडी है ! 

अब आप सरल भाषा मैं पूर्ण परिभाषा समझीये :

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हिंदू आजादी के बाद भी घुट घुट कर जी रहा है   

1000 वर्ष की गुलामी के बाद हमें आज़ादी मिली और आजादी के ६४ वर्ष पूरे हो चुकें हैं | वक्त आ गया है कि समीक्षा करी जाए कि हिंदू समाज इन ६४ वर्षों मैं कहाँ पहूँचा; तथा हमने क्या पाया और क्या खोया |

निम्लिखित तत्त्व आप सबको भी मालूम है फिर भी एक बार गौर फर्मा लें :
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हिंदुओं का भौतिक धर्म गुलामी के समय कैसे घटाया गया   

संषेप मैं नीचे प्रस्तुत है कि भौतिक(PHYSICAL) धर्म को गुलामी के समय कैसे घटाया गया :
1. चुकी अविवाहित कुमारी कन्याओं को जबरदस्ती उठा कर ले जाया जाता था, तो कम उम्र मैं शादी का प्रचलन चालू हो गया |
2. कन्यायों के साथ जो जुल्म और अत्याचार हो रहा था, तथा चुकी उससे निबटने का का कोइ विकल्प नहीं था, इसलिये लोग कन्या के पैदा होते ही उसे मारने लगे |
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आवश्यकता है हिंदुओं की मानसिकता बदलने की, ताकी वो बदलाव और सुधार ला सकें   

हिन्दुस्तान मैं जो भी समस्याएँ हैं वो इस लीये हैं क्यूंकि हिंदू पूरी तरह से कर्महीन जीवन बिता रहा है; इस मानसिकता को बदलना होगा | यह मानसिकता १००० वर्ष की गुलामी की देंन है | आजादी के बाद इसे बदलने का कोइ प्रयास नहीं करा गया |

निम्लिखित कुछ PHYSICAL VERIFIABLE PARAMETERS हैं जो कि धर्म की सफलता/असफलता समाज मैं दर्शाते है:
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ABOUT ME:

A Consulting Engineer, operating from Mumbai, involved in financial and project consultancy; also involved in revival of sick establishments.

ABOUT MY BLOG: One has to accept that Hindus, though, highly religious, are not getting desired result as a society. Female feticide, lack of education for girls, dowry deaths, suicides among farmers, increase in court cases among relatives, corruption, mistrust and discontent, are all physical parameters to measure the effectiveness or success/failure of RELIGION, in a society. And all this, despite the fact, that spending on religion, by Hindus, has increased drastically after the advent of multiple TV channels. There is serious problem of attitude of every individual which need to be corrected. Revival of Hindu religion, perhaps, is the only way forward.

I am writing how problems, faced by Indian people can be sorted out by revival of Hindu Religion.