JUST REMEMBER RAMAYAN IS HISTORY OF HUMANS

I need your view on this: “My RAM was neither a criminal nor a hypocrite who would bless the abduction of Sita by requesting Agni Dev for safe keeping, and then ask for Agni Pariksha. As if this was not enough, he would then disown Sita to APPEASE his public and satisfy his hunger for power. No he did no such things.”

The correct interpretation: Shri Ram and Mata Sita established AGNI PARIKSHA AS AN ADHARM.

The correct interpretation of facts in Ramayan is arrived at by accepting that Ramayan, being History of HUMANS, NO SUPERNATURAL or MIRACULOUS powers was available to any of the characters.

Friday, February 10, 2012

गीता और वंदे मातरम

   GITA , VANDE MAATRAM
गीता समस्त धर्म की जड़ है, वह सब धर्म का सोत्र है, यदी धर्म की भी उत्पत्ति होई है, तो गीता समस्त धर्म की माँ है !   


धर्म, समाज और समाज में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति के लीये नियम और मार्गदर्शन करता है , इसलिए गीता धर्म ही है, परन्तु समस्त धार्मिक पुस्तकों, या उपदेशो से अलग ! गीता सिर्फ प्रेरणा है ; प्रेरणा की एक ऐसी नदी, जिसके पास आप पहुँच जाएं, तो जीवन प्रेरणा से भर जाएगा !

क्या कारण है, हम इतने कर्महीन क्यूँ हैं, तथा हमारे मन में यह विचार भी नहीं आ पा रहा है कि यदि दो शब्द 'वंदे मातरम्' से इतनी प्रेरणा मिल सकी कि हम आजादी कि लड़ाई जीत सके ; तो या तो हमारी नियत में खोट है, या हमें जान बूझ कर गीता से ज्यादा गीता के अनुवाद करने वाले लोगो को महत्त्व दिलाने की चेष्ठा करी जा रही है !

प्रश्न सिर्फ इतना है कि क्या युद्ध के आरम्भ में भगवान कृष्ण ने धर्म या ज्ञान का उपदेश दिया था, या, प्रेरणा रूपी सोत्र से अर्जुन को अपने कर्म पर चलने के लीये प्ररित करा ?

वैसे किसी से भी यदि यह प्रश्न पुछा जाएगा तो वह प्रश्न पूछने वाले को मुर्ख बताएगा या यह समझ लेगा की उसका उद्देश नेक नहीं है ! क्यूँकी युद्ध के आरम्भ में प्रेरणा भरे सोत्र कहे जाते हैं, न की धर्म का उपदेश ! धर्म का उपदेश युद्ध में उस व्यक्ति को दिया जाता है जो गंभीर रूप से घायल हो, मृत्युशय्या पर पहुँच गया हो !

युद्धक्षेत्र में पहुँच कर युद्ध ना करने का कोइ भी कारण बताना कर्महीनता ही कहलाता है ! अर्जुन से ज्यादा, पूरे इतिहास में, कोइ भी व्यक्ति इतना कठोर प्रकृति का नहीं हुआ ! जब अर्जुन ने युद्ध न करने की ठान ली, तो श्री कृष्ण को गीता के प्रेरणा भरे सोत्र से उनको युद्ध के लीये प्रेरित करना पड़ा !

गीता के अनुवाद से वह प्रेरणा क्यूँ नहीं मिल पा रही ?
कोइ बात नहीं, नहीं मिल पा रही; लेकिन इस बात को स्वीकार तो करो कि यहाँ अनुवादक गीता के साथ पूरा न्याय नहीं कर पा रहे हैं !.

उपयुक्त रहेगा हाल के कारगिल युद्ध को याद करना, जहां उचाई पर शत्रु सेना के ठिकानों को, पहाड़ पर चढ कर अत्यंत विपरीत स्तिथी में भारतीय जवानो ने, बलिदान दे कर अपने कब्जे में करें ! आज भी कारगिल युद्ध, विश्व में, सैनिको को कैसे प्रेरित करा जाता है, उसकी मिसाल है! वह बात अलग है कि भारतीय सेना के जवान की वीरता, जग प्रसिद्ध है !

एक और उद्धरण::

श्री बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित दो शब्ग; जिन्होंने अंग्रेजो की नींद उड़ा दी: आजादी से पूर्व, आ़जादी चाहने वाले भारत के बच्चे-बच्चे के होठों पर एक ही मंत्र था 'वंदे मातरम्' !

इन शब्दों की शक्ति तो देखो: 'वंदे मातरम्' ; मात्र दो शब्द, छह अक्षर । अनंत शक्ति का सोत्र रहे थे यह दो शब्द ! अंग्रेजो के सिपाहियों की बन्दूक की गोली जब भारतीय की छाती पर लगती, तो जमीन पर गिरते समय एक ही आवाज़ निकलती थी 'वंदे मातरम्' ! कितने ही क्रांतिकारियों ने 'वंदे मातरम्' का नारा लगाते हुए गोलियां खायीं, फांसी के फंदे को गले लगा लिया। इन दो शब्द की प्रेरणा के बारे में और क्या बोला जाय कि अंग्रेजो की नीद मात्र इन दो शब्दों ने उड़ा दी ! सुभाषचंद्र बसु की 'आजाद हिंद फौज' के सिपाही 'वंदे मातरम्' का नारा लगाते हुए ही शहीद होते थे।

और कहाँ गीता ?

प्रेरणा से भरा सोत्र, जिसका न आर है न पार ! लेकिन क्या करा अनुवादकों ने ? कहाँ गायब हो गया श्री कृष्ण का जादू ? यदी मात्र दो शब्द 'वंदे मातरम्' से इतनी प्रेरणा मिल गई कि भारत गुलामी की जंगीर तोड़ सका तो गीता से कितनी प्रेरणा मिलती ?

में गीता के समस्त अनुवादकों का सम्मान करता है, और इस बात को भी स्वीकार करता हूं कि उनके अनुवाद के कारण ही गीता आज मैंनेजेमेंट के छात्रों को पढाई जा रही है ! लेकिन गीता से प्रेरणा जो मिलनी चाहीये, वोह लाभ हिंदू समाज को नहीं मिल पा रहा है ! इस सचाई को हिंदू समाज को बताने में धार्मिक गुरु व् इनके समर्थक इतना विरोध क्यूँ करते हैं ?

क्या धर्म का इतना व्यावसायीकरण हो गया है कि नैतिकता पूर्ण रूप से समाप्त हो गई है ? क्या व्यावसायीकरण के लाभ के लीये कोइ यह भी नहीं बता पा रहा है कि गीता का अनुवाद पर्याप्त व् संतोषजनक नहीं हो पाया है ! उल्टा जो अनुवाद की आलोचना करता है, उसे धार्मिक गुरुजन व् उनसे जुड़े लोग यह कह कर झूटी आलोचना करते हैं कि “देखो यह तो गीता तक की आलोचना कर रहे हैं , यह इंसान हिंदुओं का शत्रु है “ !

लेकिन आम हिन्दुस्तानी इतना कर्महीन क्यूँ हैं? वोह इसका विरोध क्यूँ नहीं कर पा रहा है ! आज सूचना युग में जब एनेक माध्यम है अपना आक्रोश व्यक्त करने का या अपनी बात कहने का आप अपने विचार तो व्यक्त कीजिये !

क्या हमें गलत धर्म सिखाया जा रहा है ? कैसे यह सुनिश्चित होगा के हमें सही या गलत धर्म सिखाया जा रहा है ?

साधरण प्रश्न है और छोटा सा उत्तर ! प्रमाणित आकडे यह दर्शाते हैं कि आजादी के बाद धर्म सम्बंधित वय हिंदुओं का अत्यधिक बढा है, परन्तु आजादी के बाद हिंदू समाज में गरीबी बढ़ी है ! उधर आजादी के बाद धर्मगुरुजनों की आर्थिक स्थिती में जबरदस्त  सुधार हुआ  है , और वह जब, जब अधिकाँश गुरुजन पैसे को हाथ नहीं लगाते हैं, संन्यास की घोषणा कर चुके हैं , तथा संसारिक सुख त्याग चुके हैं ! स्पष्ट है कि गलत धर्म बताया जा रहा है; हिंदू समाज को गुलामी की तरफ ले जाया जा रहा है !

हमें गीता से प्रेरणा चाहीये , तभी हिंदू समाज और हिन्दुस्तान का उद्धार होगा ; वंदे मातरम् !!!

Monday, January 30, 2012

क्या स्वर्ग में बैठे देवता मनुष्यों के तप से घबरा जाते हैं

DO DEVTAS SITTING IN SWARG GET THREATENED BY TAPS OF WE EARTHLINGS?’
ऐसे अनेक प्रसंग हैं कि देवता, मनुष्य के तप से घबरा जाते हैं, और इसी बात से यह कहावत भी आम है कि इन्द्र का सिंघासन डोल गया ! क्या इसमें कुछ सचाई है ? क्या वास्तव में तप को खंडित करने के लीये अप्सरा भेजी जाती हैं ?

इससे दो सन्देश मिलते हैं !

इस प्रश्न के उत्तर से पूर्व तप की परिभाषा क्या होनी चाहीये, इसपर जरा सोच लें ! हिंदू शास्त्रों में सामूहिक कठोर प्रयास को यज्ञ कहा जाता है ओर व्यक्तिगत कठोर प्रयास को तप ! तप का अर्थ हर समय आँख बंद करके इश्वर में लीन होना नहीं है; तप का अर्थ है व्यक्तिगत कठोर प्रयास !

यदि व्यक्ति पूरी निष्ठां और सकारात्मक भाव से किसी भी धार्मिक कार्य में यथाशक्ति प्रयत्नशील है , तो वह नियति में भी परिवर्तन कर देता है, तथा हर धर्म किसी न किसी रूप में इसको स्वीकार करता है ! हर मनुष्य की स्वंम की ऊर्जा होती है, जो की पृथ्वी की उर्जा से सकारात्मक या नकरात्मक स्थर पर संबंध स्थापित करती है ! पृथ्वी की उर्जा का संबंध सदा सौर मंडल की उर्जा से रहता है , और सौर मंडल का ब्रह्मांड से ! धार्मिक कार्य चुकि समाज के लीये लाभकारी होता है, समस्त विश्व की उर्जा उसका सत्कार करती है तथा उस तप को प्रतिष्टित करने में सकारात्मक भाव रखती है ! इसी लीये महान पुरुष के कार्य के साथ अनेक दन्त कथा जुड जाती हैं, तथा उस तप को अलोकिक रूप दे देती हैं !

इसी सन्दर्भ में यह भी समझ लें कि नकरात्मक ऊर्जा क्लेशवर्धक होती है ! जब समाज में अधिकाँश व्यक्ति कर्महीन होते हैं तो क्लेशवर्धक ऊर्जा समाज को विनाश की और ले जाती है ! येही हिन्दुस्तान में हो रहा है ! एक छोटा सा उद्धारण उपयुक्त रहेगा !

हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र है, अथार्त समस्त अधिकार समाज के पास हैं ! आजादी के ६४ वर्ष में भ्रष्टाचार बढ़ा है, और वह जब , जब की ९८ % लोग भ्रष्ट नहीं हैं, तथा जो २ % भ्रष्ट लोग हैं वह भी कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार समाप्त होना चाहीये, लेकिन भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है ! क्या यह हमारी कर्महीनता की नकरात्मक उर्जा का प्रभाव नहीं है , कि हम प्रजातंत्र के बाद भी , तथा जहां १०० % हिन्दुस्तान यह कह रहा है कि भ्रष्टाचार समाप्त करने हेतु तत्काल रचनात्मक कार्य होने चाहीये , भ्रष्टाचार बढता जा रहा है !

पहला सन्देश ‘इन्द्र का सिंघासन डोल गया’ से यही है ! परन्तु हर पुराण में देवताओं के स्वंम के नकरात्मक विचार कुछ और सन्देश भी दे रहे हैं , जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है ! ध्यान रहे समस्त पुराण देवों के नकरात्मक व्यवाहर से भरे पडे हैं, ताकी किसी त्रुटि की कोइ संभावना न रहे , महाऋषि और ऋषिजनों के अभ्रद तथा शोषणपूर्ण व्यवाहर का भी रह रह कर उल्लेख पुराणों में मिलेगा ! इन महान हस्तियों द्वारा महिलाओं के साथ दुराचार और छल के व्यवाहर के भी अनेक प्रसंग हैं ! इन प्रसंगों का वर्तमान समाज के लीये कुछ तो महत्त्व है, कोइ महत्वपूर्ण सन्देश है, जो अगर अनकहा रह गया तो समाज का विकास संभव नहीं हो सकता ! एसा भी नहीं है कि उसके लीये विशेष दूरदर्शिता की आवश्यकता है इस सन्देश को समझने के लीये ! कोइ भी व्यक्ति इसका इतना अर्थ तो निकाल सकता है कि समाज में जो अधर्म के कारण जो कर्महीनता बस गई है वह इस लीये की गलत धर्म सिखाया जा रहा है ! तथा इसका प्रमाण भी है, एक ऐसा प्रमाण जिसे नकारा नहीं जा सकता !

हिंदू समाज का आजादी के बाद धर्म और धर्म सम्बंधित कार्यों में वय अत्यधिक बढा है , परन्तु इसके बाद भी हिंदू समाज में गरीबी बढ़ी है , जबकी धार्मिक गुरुजनों की आर्थिक व् सामाजिक स्तिथी में जबरदस्त सुधार आया है ! राजनीती में उनका गहरा प्रभाव है ! हर तरह से शक्तिशाली हैं हमारे धार्मिक गुरुजन , और टूटने के कगार पर खडा है हिंदू समाज ! पुराण और प्राचीन इतिहास का सन्देश स्पष्ट है ! समय समय पर जब समाज पतन की और बढ़ता है तो इन धार्मिक गुरुजनों का हाथ अवश्य होता है ! परन्तु हर बार तो प्रभु मनुष्य अवतार ले नहीं सकते ; या यूँ कहिये कि हर बार स्तिथी इतनी खराब भी नहीं हो सकती कि उसे सुधार न जाय, तथा प्रभु को अवतार लेना पड़े !

निर्णय समाज में हर शिक्षित व्यक्ति को लेना है , क्यूँकी जब सब अपने आस पास इस विषय पर निरंतर चर्चा करेंगे तो परिणाम समाज हित में होगा ! यह मत सोचिये कि में क्यूँ करूँ , बाकी सब लोग हैं करने के लीये ! अपनी कर्महीनता से युद्ध हर व्यक्ति को स्वंम आरम्भ करना होगा, ताकी आने वाली पीढ़ी दुबारा गुलाम न हो सके !

कृप्या यह भी पढीये :
हिंदू आजादी के बाद भी घुट घुट कर जी रहा है
धार्मिक आद्यात्मिक साधू तथा गुरु की परिभाषा
त्रेता युग विज्ञान और विमान का युग था

Thursday, January 26, 2012

वन जाने में कैकई ने राम की सहायता क्यूँ करी

DID KAEKAI ARRANGED VANVAAS FOR RAM ON HIS REQUEST?
अब जब कि सब राजकुमार विवाहित हो गये तो महाराज दसरथ अपने अंतिम उत्तरदायित्व से भी मुक्त होना चाहते थे, और वह था युवराज की विधिवद घोषणा और तिलक ! परिवार में इसको लेकर कोइ विरोध भी नहीं था, कि ज्येष्ट पुत्र श्री राम ही इसके उत्तराधिकारी हैं ! समस्या थी तो केवल इतनी कि श्री राम विवाह से पूर्ण रावण को वचन दे आये थे कि वे वानर के पुनर्वास हेतु १४ वर्ष वन में रहेंगे ! राम इस कार्य पर तत्काल प्रगति करना चाहते थे और उसके लीये वे निवेदन भी कर चुके थे कि भरत को युवराज मोनोनीत कर दिया जाय ! इसके लीये न तो भरत न ही राजपरिवार के अन्य सदस्य सहमत थे ! सबका यह कहना था कि राम इस कार्य को जब राम कि संतान बड़ी हो जाय, तब भी कर सकते हैं ! संषेप में कोइ भी राम का इसमें साथ नहीं दे रहा था ! विस्तार के लीये पढ़ें: रामायण ..त्रेत्र युग का इतिहास

उस युग के अपने अलग आदर्श थे ! संभवत: इसीलिये दसरथ ने राम के मन की स्थति जानते हुए यह प्रसंग तब गंभीरता से उठाया जब भरत भी नहीं थे ! एक अत्यंत शुभ मुहूर्त आ रहा था, तथा दसरथ ने अपना यह निर्णय सुना दिया कि वह राम का युवराज पद पर राजतिलक आने वाली शुभ मुहूर्त में ही करेंगे ! घोषणा हो चुकी थी; राम के पास निकलने का कोइ विकल्प नहीं था ! वह यह भी जानते थे कि यह सब इतनी जल्दी में क्यूँ हो रहा है ! एक आदर्श पुत्र के नाते वे पिता के आदेश की अवहेलना भी नहीं कर सकते थे !

ऐसे में स्वाभाविक ही था कि उन्हें अपनी प्रिये माता, कैकई का ध्यान आया ! कैकई के पास जा कर राम ने अपनी दिल की बात फिर दौराही ! वानर अत्यंत ही कष्टदायक जीवन व्यतीत कर रहे थे ! उनका पुनर्वास प्राथमिकता से ही करना होगा, उन्होंने माता को समझाया ! इसलिए वोह युवराज नहीं बन सकते ! कैकई ने स्पष्ट करा कि अब इस बात का समय नहीं है; अत्यंत ही हर्ष, उलास का वातावरण है, उसमें किसी प्रकार का अवरोध नहीं आना चाहीये ! माता ने फिर कहा कि वैसे भी तुम्हे रोक कौन रहा है, जब तुम्हारी संतान बड़ी हो जाय, तुम इस कार्य को अवश्य पूर्ण करना ! फिर उन्होंने राम को संतान के कर्तव्य याद दिलाय ! पिता वृद्ध हो चले थे, अत: उनका बाकी जीवन सुख से ही बीतना चाहिये !

प्राय हर इंसान अपनी माता को समझाना जानता है, और वोह तो राम थे ! माता को राजा के कर्तव्य की याद दिलाई जो की व्यक्तिगत कष्ट से ऊपर हैं ! एक इंसान को अगर जानवर समझ कर दुर्व्यवाहर करा जाय, तो राजा का कर्तव्य होजाता है कि न्यायउचित कार्य करे, और यहाँ तो पूरी वानर जाति को पशु समझा जा रहा है ! मार्ग कष्टदायक है, लेकिन राजा और रानी को तो कर्तव्य पालन के लीये उसपर चलना ही पड़ता है , राम ने याद दिलाया ! कैकई के पास उसका कोइ उत्तर नहीं था ! राम ने कैकई को यह भी याद दिलाया कि उनके विचार विभिन् सामाजिक बिन्दों पर क्या है !”अब समय आ गया है कि समाज और परिवार धर्म में से एक को चुनने का” राम ने कहा ! ‘एकाधिक विवाह’ अर्थात एक व्यक्ति एक पत्नी को भी चर्चा में लाया जा सकता है, राम ने बताया !

सब कैसे होना है, राम ने यह भी समझाया ! कैकई घबरा गयी ! “पूरे परिवार और अपने पुत्र भरत की दृष्टि में भी मैं गिर जाउंगी” कैकई ने विरोध करा !

लेकिन राम ना सुनने तो आए नहीं थे ! कैकई उनकी प्रिय माता थी ; माता को पुत्र ने मना लिया ! कैकई राजा दसरथ से दो वर मांगने के लीये तैयार हो गई !

प्रश्न यह है कि इस प्रसंग में देवी सरस्वती और मंथरा का कोइ उल्लेख क्यूँ नहीं है ! मैं अपने घर में श्री राम कि तस्वीर पूजा स्थान पर रखता हूं ; इस विश्वास से कि केवल तस्वीर रखने मात्र से घर मैं कोइ क्लेश संभव नहीं है ! फिर मैं कैसे मान लूं कि राम कि प्रिय माता को देवी सरस्वती ने मंथरा द्वारा भटका दिया ! वैसे भी यह ब्लॉग अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियों पर विश्वास नहीं रखता !

इस प्रसंग से राम के कार्यप्रणाली पर भी प्रकाश पड़ता है जो की अंत तक हर बिंदू को समझ कर, तथा समाज हित, केवल समाज हित को ध्यान में रख कर आगे बढ़ने पर ही केंद्रित थी !

रामायण को इतिहास समझ कर पढेंगे तो आपको अधिक आनंद आएगा !

कृप्या यह भी पढ़िए :
राम से पूर्व... धर्म का उपयोग स्त्री जाती के शोषण के लिये
कलयुग का अंत..एक नए कल्प का प्रारम्भ और मत्स्य अवतार

Sunday, January 22, 2012

राम राज्य ..सामाजिक न्याय और धर्म का राज्य

RAM RAJYA..AN EQUAL OPPORTUNITY RULE OF LAW
इससे पहले कि आगे बढ़ें सनातन धर्म का अर्थ समझ लेते हैं ! सनातन धर्म का गैर किताबी अर्थ है , सम्पूर्ण हिंदू समाज का विकास जिसमें सबके पास बराबर के विकास के अवसर हों !

राम राज्य उस विकासशील राज्य को कहते हैं जो राम ने अयोध्या का राज्य ग्रहण करने के पश्चात करा ! उस राज्य में निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया थी जिसके सामने राजा और आम व्यक्ति एक सामान थे ! अन्याय किसी के साथ संभव नहीं था ! ऐसी मान्यता है कि यदि कोइ राजा ऐसी निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के साथ राज्य कर सके तो प्रकृति व् इश्वर उस राज्य को सुख और समृद्धि से परिपूर्ण रखता है, तथा जीवित माता पिता के सामने संतान कि भी मृत्यु नहीं होती ! राम राज्य ऐसा ही राज्य था , जिसमें धर्म और राजकीय व् सामाजिक न्याय में सामंजस्य था ! ऐसा राज्य केवल चक्रवर्ती सम्राट राम के समय में ही संभव हो पाया है !

ध्यान रहे कहने में और करने में अंतर होता है ! निष्पक्ष न्याय करना अत्यंत ही जटिल कार्य है ! अनेक ऐसे विषय होते हैं जिसमें समझोता करना पड़ता है !, स्वंम राम ने युद्ध की स्थिति में समझोते (बाली वध के समय) करें थे, लेकिन तब वोह राजा नहीं थे ! यह एक सन्देश है राम राज्य का कि निष्पक्ष न्याय अत्यंत जटिल है !

राजा को, कभी अपनी जनता को खुश रखने के लीये तो कभी राज्य से जुड़े होए शक्तिशाली व्यक्तियों के लीये, समझोते तो करने ही होते हैं ! आज भी धार्मिक गुरुजन यह प्रचार कर रहे हैं कि सीता का त्याग राम ने सिर्फ एक धोबी के कहने पर कर दिया ! रामायण तो सब ने पढ़ी है, और तो और टीवी पर भी देखी है ! क्या सीता के अपहरण में आपको सीता का दोष कही विदित हूआ ! यदि नहीं तो सीता का त्याग राम ने क्यूँ करा ? और यदी करा तो राम राज्य कि स्थापना क्या संभव थी ? ध्यान रहे प्रकृति और इश्वर तो निष्पक्ष हैं, यदी वोह उस राज्य को आशीर्वाद दे रहे हैं तो तभी संभव है जब निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया हो; अर्थात महारानी सीता को भी न्याय का उतना ही अधिकार था जितना कि एक आम नागरिक को !

नहीं यह किसी तरह से संभव नहीं है कि जिस राम राज्य कि परिभाषा को ले कर हम सब चल रहे हैं उसमें सीता के साथ अन्याय हूआ हो ! यदी एक धोबी के कहने मात्र से महारानी सीता का त्याग संभव था, तो उस राज्य को प्रकृति और इश्वर का आशीर्वाद कैसे संभव था ? या तो राम राज्य कि परिभाषा गलत बताई जा रही है य हमें ‘धोबी के कहने पर सीता का त्याग’ वाली बात गलत बताए जा रही है ! सत्य तो यह है कि सीता का त्याग एक निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के बाद हूआ जिसके अध्यक्ष स्वंम श्री राम थे ! चुकी समस्त भौतिक तथ्य सीता के विरुद्ध थे, तथा केवल अग्नि परीक्षा सीता के पक्ष में था, राम ने सीता का त्याग अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त करते होए, सीता का त्याग भौतिक तथ्यों के आधार पर निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया से करा !

विस्तार में जानकारी के लीये आप पढ़ सकते हैं: सीता का त्याग राम ने क्यूँ करा... सही तथ्य....तथा यह भी : राम से पूर्व... धर्म का उपयोग स्त्री जाती के शोषण के लिये

अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त करने का कारण, श्री राम ने यह दिया कि इससे किसी भी स्त्री के चरित्र का आकलन संभव नहीं है, तथा यह आदेश भी पारित करा कि अग्नि परिक्षा अब अधर्म माना जाएगा !

एक अन्य विषय जो अति आवश्यक है वह यह कि अयोध्या का राज्य संभालने के पश्यात, श्री राम ने समाज में वानर जाति को मनुष्य का दर्जा दिया ! इससे पहले वानर को मनुष्य समुदाय, तथा राज्य मनुष्य नहीं मानते थे, और जानवर मान कर उनपर दुराचार करते थे ! यही मुख्य कारण था कि राम ने १४ वर्ष के वनवास में, वानर जाति को जो प्रशिक्षण दिया था, उसका उपयोग कर के वानर सेना कि सहायता से रावण जैसे शक्तिशाली राजा को परास्त करा ! पढ़ें: राम सुग्रीव मैत्री संधि ...एक विश्लेशण

श्री विष्णु का प्रमुख उद्देश श्री राम के रूप में अवतरित होने का इस प्रकार था :
1. स्त्रियों पर विभिन् प्रकार के अत्याचारों को समाप्त करना, तथा अग्नि परीक्षा जैसा असामाजिक शोषण, जिसको धार्मिक मान्यता भी प्राप्त थी उसे अधर्म घोषित करना!
2. कमजोर वर्ग को सामान्य अधिकार समाज में दिलाना! वानर नई प्रजाति थी जो सतयुग में प्राकर्तिक विकास से उत्पन्न होई थी, और जिनके पूँछ थी ! वानर जाती को मनुष्य समाज ने तथा समस्त राज्यों ने मनुष्य मानने तक से इनकार कर रखा था, और उनके साथ जानवर जैसा दुर्व्यवहार होता था !
3. एक ऐसे राज्य की स्थापना करना जिसमें किसी तरह का अत्याचार हो, समाज में धन, जाती, या उत्पत्ति के नाम पर कोइ भेद भाव हो, तथा निष्पक्ष न्याय हो! इसी राज्य को हमसब राम राज्य के नाम से भी जानते हैं
अंग्रेजी में पोस्ट: RAM RAJYA was the Rule of Civil and Dharmic LAWS

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