Monday, October 24, 2011

श्री राम की अनावश्यक आलोचना समाप्त करने मैं सहायता करें

यह अविवादित मान्यता है कि यदी कोइ राजा निष्पक्ष न्याय करता है, तथा कोइ भेदभाव या सत्ता मैं रहने से प्ररित नियम नहीं बनाता है, तथा समाज कल्याण ही उसका उद्देश होता है तो ऐसे राज्य मैं अकाल मृत्यु नहीं हो सकती, तथा माता पिता के जीवित रहते संतान की मृत्युं भी संभव नहीं होती|रामराज्य ऐसा ही राज्य था|
अब हम हिंदुओं की मानसिकता देखिये | हम यह भी नहीं समझ पा रहें हैं कि एक साधारण मनुष्य भी ऐसे राज्य मैं अपनी पत्नी का त्याग बिना निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के नहीं कर सकता था| तो महारानी सीता का परित्याग बिना निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के संभव था?
और वोह भी जब, जब माता सीता ने पूरे सेना के सामने अपने चरित्र का प्रमाण अग्नि परीक्षा से दिया!
जबभी किसी स्त्री पर कहीं भी अत्याचार होता है, समाज के कुछ लोग यह कह कर उसकी आलोचना करते हैं कि भगवान श्री राम ने भी सीता कि अग्नि परीक्षा ली थी और इसके बाद भी माता सीता का त्याग कर दिया !
त्रेतायुग मैं महिलाओ पर अनेक अत्याचार होरहे थे, अग्निपरीक्षा जिसका प्रमाण है|
कृप्या शालीनता के मानको मैं बदलाव और हेरफेर करके अग्नि परीक्षा सेजो महिलाओं केसाथ बर्बरता होरही थी, उसको समझाने का प्रयास नकरें|उदहारण, स्पष्टीकरण:श्री राम ने असली सीता को अग्निदेव से वापस लेनेके लिए यहसब किया|समाज ऐसेसब स्पस्टीकरण अस्वीकार करता रहाहै, श्री राम और माता सीता ने अग्निपरीक्षा को अधर्म स्थापित करा |

और उसका कारण यह है कि जब सुचना का अभाव था तो उस समय हिंदू समाज को संतुष्ट करने के लीये एक स्पष्टीकरण डाल दिया गया था, कि श्री राम ने सीता को चुपके से(ध्यान रहे चुपके से –बिना किसी को बताए; और जब लक्ष्मण भी नहीं थे) अग्नि देव को सौंप दिया और सीता कि छाया रख ली| उस स्पष्टीकरण से यह समझाने कि कोशिश करी गयी कि अग्नि परीक्षा का उद्देश असली सीता को वापस लाना था| जब सुचना का अभाव था, तो शायद यह स्पष्टीकरण समाज को संतुष्ट करने के लीये पर्याप्त था, लकिन आज नहीं ---हम सुचना युग मैं जी रहे हैं| यह भी बात गौर करने लायक है कि सीता को अग्नि देव को सौपा अकेले मैं, और अग्नि परीक्षा सब के सामने लीगयी| 

इसी विवास्पद स्पष्टीकरण के कारण आज जब भी किसी स्त्री पर अत्याचार होता है, लोग, प्रेस. टीवी, मीडिया, यह कह कर भगवान श्री राम का अपमान करते हैं कि श्री राम ने भी तो सीता कि अग्नि परीक्षा ली थी|
ध्यान रहे स्पष्टीकरण इतिहास का तत्त्व नहीं होता है | आप अपने आसपास किसी से भी पूंछइये कि क्या रामायण इतिहास है? आपको येही उत्तर मिलेगा कि हाँ यह इतिहास है; शायद कुछ लोग यह भी कहें कि उस समय विमान भी थे|
अब यहाँ से आपकी लड़ाई शुरू होती है अपनी मानसिकता से>> क्या आप मैं इतनी शक्ती है कि आप रामायण को इतिहास मान सके?

ध्यान रहे इतिहास मानने के लिये आपको यह मानना पड़ेगा कि किसी के पास भी चमत्कारिक या आलोकिक शक्ती नहीं थी| कभी आप ने सोचा है कि अवतार और भगवान मैं क्या अंतर होना चाहीये, या है? 
और हम हिंदूओं की मानसिकता देखिये कि हम एक छोटी सी बात नहीं समझ पा रहे हैं कि किसी छोटे से छोटे गांव के मुखिया के लीये भी यह संभव नहीं था न है, की वो अपनी पत्नी का त्याग बिना अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त करे बगैर कर सके | और हम विष्णु अवतार श्री राम की बात कर रहे हैं जिन्होंने रामराज्य के स्थापाना करी |
नहीं, बिलकुल नहीं! विष्णु अवतार, श्री राम, धर्म की स्थापना करने आये थे और धर्म की स्थापना उचित उद्धारण से ही हो सकता थी, इतनी छोटी से बात तो हम समझ ही सकते हैं|

प्रश्न यह है कि माता सीता और श्री राम इस उद्धरण से क्या धर्म स्तापित करना चाहते थे ?

प्रश्न हमारी मानसिकता का भी है जो कि इतनी शक्तिहीन है कि जो बात एक साधारण हिंदू को,,, नहीं एक गंवार हिंदू को भी समझ मैं आ जायेगी; वो अपनी कर्महीनता कि वजह से हम कह नहीं पाते |

अब आपको वो सब सोचना पड़ेगा जो कि हिंदू समाज के लीये लाभकारी है, तथा दुर्भागवश पिछले ६४ वर्षों मैं नहीं सोचा गया|

आप गर्व से पूरे समाज को यह कह पायेंगे कि श्री राम और माता सीता ने अग्नि परीक्षा को अधर्म घोषित करने के लीये व्यक्तिगत मानसिक यातनाये/कष्ट उठाये|
यह सर्वविदित है कि सत्ययुग और त्रेता युग मैं कमजोर वर्ग और स्त्रीओं पर अत्याधिक अत्याचार होए हैं जिसके कारण भगवान को अनेक बार अवतार लेना पड़ा | 
यह बात भी समझने लायक है कि जिस युग मैं जितने ज्यादा अवतार होते हैं उस युग मैं अधर्म और अत्याचार अधिक होता है क्यूँकी भगवान तो अवतार तभी लेतें हैं जब अधर्म और अत्याचार को समाप्त करने का कोइ और विकल्प बचता नहीं है | 
इसी परीपेक्ष मैं जब हिन्दूओं पर होए पिछले १००० वर्ष की गुलामी मैं जुल्म, अत्याचार, अमान्विये व्यवाहर के बारे मैं सोचेंगे तो आपको एक मापदंड का आभास होगा कि कितना जुल्म, अत्याचार, अमान्विये व्यवाहर पर्याप्त है भगवान को मनुष्य रूप मैं अवतार लेन के लीये| यह निशित है कि पिछले १००० वर्ष की गुलामी मैं जुल्म, अत्याचार, अमान्विये व्यवाहर पर्याप्त नहीं था भगवान को मनुष्य रूप मैं अवतार लेन के लीये|
रामायण यदी इतिहास है तो बहुत स्पष्ट रूप से आपको यह दिख जाएगा कि :
१. राम के जनम से पूर्व स्त्री जाती पर अत्याधिक अत्याचार हो रहे थे, जिसमे धार्मिक लोग का भी हाथ था|
२. अग्नि परीक्षा भी एक ऐसा अत्याचार था, जो कि उन मजबूर और लाचार स्त्रीयों पर करा जाता था, जिनको की जबरदस्ती अगवा कर लिया जाता था
ऐसे मैं यदी हम रामायण को इतिहास मानते हैं और श्री राम को अवतार, तो यह भी मानना पडेगा कि श्री राम और माता सीता ने अग्नि परीक्षा को अधर्म घोषित करने के लीये अवतार लिया था| इस सच को स्वीकार करते ही स्र्तीयों पर अत्याचार कम हो जायेंगे|

इसके लीये आपको विशेष प्रयास भी नहीं करने न तो किसी तत्त्व को तोड़ मरोड़ कर पेश करना है>>आपको केवल सच और इमानदारी का सहारा लेना है|

श्री राम ने यदी सच मैं कभी भी राम राज्य की स्थापना करी थी तो यह बात बिलकुल तय है कि वोह किसी के साथ अन्याय नहीं होने दे सकते थे ---यहाँ तक कि अपनी पत्नी के साथ भी >>श्री राम ने सीता का त्याग एक निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के बाद करा जिसमे सीता को अपनी बात कहने का मौका मिला तथा वो अल्पसंख्यक लोग जो सीता को महारानी के रूप मैं नहीं देखना चाहते थे, उनको भी अपनी बात कहने का मौका मिला| 

दुर्भाग्य से सारे तत्त्व सीता के विरुद्ध थे, तथा खाली एक ठोस तत्त्व सीता कि सहाय्र्ता कर रहा था और वोह था “सब के सामने सीता का सफल अग्नि परीक्षा”

श्री राम ने अग्नि परीक्षा के परिणाम को यह कह कर निरस्त कर दिया कि अग्नि परीक्षा से किसी भी स्त्री के चरित्र का आकलन नहीं संभव है |(AGNI PARIKSHA OF SITA ....FACTS , ..हिंदी में पढ़ने के लिये: सीता का त्याग राम ने क्यूँ करा... सही तथ्य )

यह भी घोषणा करी कि भविष्य मैं अग्नी परीक्षा को अधर्म माना जायेगा|

आप चाहें तो एक बार फिर से शांती से सोच लें कि “क्या श्री राम के लीये सीता का त्याग, बिना अग्नि परीक्षा के परिणाम को निरस्त करे बगैर संभव था?”

यदी सारे भौतिक तत्त्व सीता के विरुद्ध थे तो चाहे आज की न्याय प्रक्रिया हो या श्री राम के समय की सीता का त्याग तो निश्चित था | हमें अब यह भी समझ मैं आ जायेगा कि अग्नि परीक्षा जैसा विस्फोटिक प्रसंग रामायण का भाग क्यों बना |

अब हम अधर्म और पाप से भी बच पायेंगे और यह भी समाज को समझा सकेंगें कि श्री राम और माता सीता ने अग्नि परीक्षा को अधर्म घोषित करने के लीये व्यक्तिगत मानसिक यातनाये/कष्ट उठाये|

हमसब के लीये अब यह संकल्प लेना आसान भी है और धर्मअनुसार जरूरी भी कि अब हम श्री राम की आलोचना व् अपमान मिथ्या कारणों से नहीं होने देंगे|
Post a Comment

PLEASE FOLLOW AT GOOGLE+

ABOUT ME:

A Consulting Engineer, operating from Mumbai, involved in financial and project consultancy; also involved in revival of sick establishments.

ABOUT MY BLOG: One has to accept that Hindus, though, highly religious, are not getting desired result as a society. Female feticide, lack of education for girls, dowry deaths, suicides among farmers, increase in court cases among relatives, corruption, mistrust and discontent, are all physical parameters to measure the effectiveness or success/failure of RELIGION, in a society. And all this, despite the fact, that spending on religion, by Hindus, has increased drastically after the advent of multiple TV channels. There is serious problem of attitude of every individual which need to be corrected. Revival of Hindu religion, perhaps, is the only way forward.

I am writing how problems, faced by Indian people can be sorted out by revival of Hindu Religion.