JUST REMEMBER RAMAYAN IS HISTORY OF HUMANS

मेरे राम पाखंडी नहीं हैं कि सीता को अग्नि देव को सौंप कर सीता के अपहरण को स्वीकृति देंगे, और फिर पूरी सेना के सामने उनकी अग्नि परीक्षा लेंगे|सिर्फ इतना ही नहीं, फिर एक धोबी के कहने पर सीता को त्याग दंगे ~~ऐसा कुछ नहीं हुआ; श्री राम और माता सीता ने अग्नि परीक्षा को अधर्म घोषित करा | #****# My RAM was NOT a hypocrite who blessed the abduction of Sita by requesting Agni Dev for safe keeping, and then asked for Agni Pariksha. As if this was not enough, he then disowned Sita to APPEASE his public and satisfy his hunger for power. No he did no such things~~The correct interpretation: Shri Ram and Mata Sita established AGNI PARIKSHA AS ADHARM.......Remember, Ramayan, being History of HUMANS, NO SUPERNATURAL or MIRACULOUS powers were available to any of the characters.

MAHABHARAT was fought as DHARM YUDH with KAURAVS favoring and accepting GENETIC ENGINEERING and HUMAN CLONING as DHARM, while PANDAVS rejecting the same and declaring NATURAL PROCESS OF CHILD REARING as DHARM....MAHABHARAT was the FIRST WORLD WAR

हिंदी कि पोस्ट ; LIST OF POSTS IN HINDI

हिंदी पोस्ट , लिंक समेत ; सबसे हाल कि पोस्ट पहले :
STARTING FROM MOST RECENT :
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वानर सेना के साथ श्री राम का लंका से युद्ध निर्णय उचित था पर भय-रहित नहीं


During Ramayan era, the scientific growth was much more that what we have seen till now. As such it is wrong to think that Ravan’s army equipped with sophisticated weapon lost to stone throwing Vaanar Sena or Monkey army~~उस समय विज्ञान का विकास आज के युग से ज्यादा था, ऐसे मैं समझने वाली बात है की रावण की सेना आधुनिक अस्त्र-शास्त्र का प्रयोग कर रही थी, तो वोह पत्थर फेकने वाली वानर सेना या बंदरों की सेना से नहीं हारी
इस विषय पर अनेक जिज्ञासुओं के प्रश्न आ रहे हैं, और सबसे पहले तो वे इस बात से सहमत नहीं हैं कि श्री राम के पास विकल्प था, अयोध्या से सेना बुलाने का| वनवास मिलने के बाद श्री राम अयोध्या से सेना कैसे मंगा सकते थे? अनेक बार जवाब देने के बाद भी वे संतुष्ट नहीं हैं, और कारण है की अब तक उन्हें यही बताया गया है कि वनवास के कारण राम के पास अयोध्या से सेना मंगाने का कोइ विकल्प नहीं था| 




आज़ाद हिंदू समाज को गलत चाबी लगा कर स्वर्ग नहीं नर्क वाले कमरे मैं डाल दिया


Independent India is a WELFARE State, and huge amount of money had been spent on welfare program. Yet the society had kept on becoming poorer, and Dharm Gurus extraordinary rich. This clearly indicate EXPLOITATION~~राष्ट्र का उद्देश समाज कल्याण है, तथा आजादी के बाद उसपर भरपूर राशी भी वय करी गयी है, परन्तु समाज गरीब होता गया, भ्रष्टाचार बढ़ता गया, तथा धर्म गुरु अत्यंत धनवान होते गए| यह तो सीधा संकेत शोषण का है
यह पोस्ट आपसब पढिये ज़रूर और अपने विचार भी व्यक्त करें, क्यूँकी विषय गंभीर है| यदी ऐसा हुआ है, तो यह पूरी तरह से धर्म के नाम पर ठगाई होई है, और बिना आप सबके प्रयास के सुधार भी नहीं होना है|





सनातन धर्म मैं सप्त ऋषि की अवधारणा


To oversee the performance of Sanatan Dharm, Sapt Rishi was a centralized committee, which was immortalized and buried~~ सप्तऋषी केन्द्रीय समिती थी; अंदरूनी शोषण के कारण समिती दफनाई जा चुकी है, ताकी बिना नियंत्रण और संतुलन के समाज का शोषण बिना रोक टोक के हो सके, और आजादी के बाद के प्रामाणिक आकडे यह दर्शा भी रहे हैं

सनातन धर्म मैं सप्त ऋषि के बारे मैं हम सब ने सुना है, कि कैसे उनका यह पवित्र कर्तव्य है कि धर्म को प्रगति की और ले जाएँ| यह भी बताया गया है कि वे अमर हैं तथा वे सफलतापूर्वक अपना कार्य करते रहते हैं| लकिन कोइ यह नहीं बताता की जो धार्मिक पुस्तके नष्ट हो गयी हैं, उनकी भरपाई वे क्यूँ नहीं कर रहे हैं, और कोइ यह भी नहीं बताता की वे वर्तमान धर्म गुरुओं को दिशा निर्देश क्यूँ नहीं दे रहे हैं, ताकी आजादी के बाद, तथा धर्म मैं पूरी श्रद्धा और रुची होने के उपरान्त भी समाज गरीब होता जा रहा है, जात के नाम पर बाटा जा रहा है, और धर्म गुरु अत्यंत धनवान, और शक्तिशाली होते जा रहे हैं|




क्या लक्ष्मी का अवतरित स्वरुप संघारकारणी का होता है ?


GODDESS  LAKSHMI CAN GIVE ALL TYPE OF PROSPERITY AND WEALTH, BUT SHE SHOWERS HER BLESSINGS TO ONLY HUMANITY AND ENVIRONMENT  FRIENDLY PERSONS~~माता लक्ष्मी, सबकुछ दे सकती हैं, लकिन वे केवल उसी पर कृपा करती हैं, जो श्रृष्टि और प्रकृति की प्रगती मैं रुचिकर है| आप सब भी इस बात का ध्यान रखियेगा |
यह पोस्ट इसलिए आवश्यक हो गयी कि अनेक जिज्ञासु यह जानना चाहते हैं, कि क्या माता लक्ष्मी जब पृथ्वी पर अवतरित होती हैं, तो उनका स्वरुप संघारकारणी का होता है? स्वंम महाऋषि वाल्मिकी ने अद्भुत रामायण मैं सीता को महाकाली का अवतार बताया है| यह भी सत्य है कि तुलसीदास जी ने माता सीता की वंदना इस श्लोक से करी :




राम से पूर्व, धर्म का दुरूपयोग महिलाओ, आदिवासी समाज के शोषण के लिए


SERIOUS MISUSE OF RELIGION DURING PRE RAM ERA FOR EXPLOITATION OF FEMALES AND ADIVASIS ~~ परशुराम उन क्षत्रियों को छोड दे रहे थे, जो उनके साथ रहने वाली महिलाओं से विवाह करने के लिए तैयार थे, और वानरों से पशु जैसा व्यवाहर न करने के लिए वचन दे रहे थे
इस विषय पर ईमेल लगातार आ रहे हैं, लोग और स्पस्टीकरण मांग रहे हैं| कारण यह है की पाठक इस बात से तो सहमत हो रहे हैं, कि देवता और धार्मिक गुरुजानो के नारी शोषण से सम्बंधित अनेक उद्धारण हर पुराण मैं है, और उसे अनदेखा भी नहीं करा जा सकता, भले ही स्पस्टीकरण उपलब्ध हो, लकिन वे श्री विष्णु के अवतारों को इनसे जोड़ा जाए यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं| श्री राम तो रावण का वध करने आये थे, और परशुराम, पृथ्वी पर से क्षत्रियों का अत्याचार समाप्त करने| यही उन्हे सदीयों से बताया गया है, तो इससे बाहर कैसे समाज को निकाला जाए ?



महाशिवरात्रि विवाह के लिए शुभ मुहूर्त नहीं है


महाशिवरात्रि को भक्त पूरी रात इश्वर शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना करते हैं, और अगली सुबह सूर्य उदय के बाद चन्द्रमा के दर्शन, सूर्य के ऊपर (उस दिन चंदामा का, चांदी जैसा लघु स्वरुप, जैसा की भगवान शिव की छबी मैं हम सब देखते हैं) सूर्य उदय के तुरंत बाद, कुछ समय के लिए होता  हैं| वोह मास का अंतिम चन्द्र होता है, जो पूर्व दिशा मैं दिखेगा| उसके बाद कम से कम दो दिन के लिए चन्द्रमा नहीं दीखता| नया चन्द्रमा दोयज को सूर्य अस्त के बाद पश्चिम दिशा मैं कुछ संमय के लिए दीखता है, जिसको देख कर मुस्लिम समाज अपना नया मास आरम्भ करता है|


सनातन धर्म मैं एकही अवतार के भिन् स्वरुप अलग अलग सामाजिक स्थिती मैं

HOW SANATAN DHARM COATS AVATAR WITH SUPERNATURAL POWERS WHEN THE SOCIETY IS WEAK, UNINFORMED, UNEDUCATED, AND LESS DEVELOPED; AND PRESENTS AVATAR WITHOUT SUPERNATURAL POWER WHEN THE SOCIETY IS DEVELOPED, EDUCATED AND INFORMED~~अवतार का स्वरुप कम विकसित, अशिक्षित समाज के लिए अलोकिक शक्ती की चादर के साथ होता है, और विकसित, शिक्षित समाज के लिए बिना अलोकिक शक्ती के 


शिव और पार्वती की अराधना प्रकृति की सुरक्षा के लिये बचनबद्धता है


नोट: आज १०, जनवरी, २०१३, को प्रयाग मैं मौनी अमावस्य का महा-कुम्भ पर्व पर महा-नहान है, और सुबह से टीवी बता रहा है की मुख्य धारा कितनी प्रदूषित हो गयी है | मन खिन्न हो गया| यह भी सही है की प्रदुषण ऊपर के शहरों और उद्योगों से आ रहा है, और हम हिंदू हो कर इसके लिए कोइ प्रयास नहीं कर रहे हैं|

कम ऊची श्रंखलाश्रृष्टि के विकास मै अवरोधक हो रही थी| इसी परिपेक्ष मैं दक्ष से सम्बंधित कथाए समझ मैं आती हैं, यह भी समझ मैं आता है, की दक्ष क्यूँ, प्राकृती के नियमों के विरुद्ध, ऐसी श्रृष्टि का विकास कर रहे थे, जो संघार रहित हो, अथार्थ शिव का उसमें कोइ भाग न हो| चुकी सति का दूसरा स्वरुप प्रकृति है, वोह यह कैसे सहन करती| एक तरफ शिव संघार के देवता, और पृथ्वी के इश्वर, जिनका अपमान हो रहा था, दक्ष के इस प्रयास से, दूसरी और दक्ष, सति के पिता| ऐसे मैं सति करती भी तो क्या करती|


आपकी लड़ाई कोइ और क्यूँ लड़ेगा, आपको खुद ही लड़नी होगी


WHY SHOULD OTHERS FIGHT YOUR BATTLES; NO YOU HAVE TO DO THIS!
हर सार्थक प्रयास से, समाज का भावनात्मक भाग कम हो जाता है और कार्मिक भाग बढ़ जाता है, जो कि समाज के अंदर रह कर समाज को खोखला करने वाले शोषणकरता को पसंद नहीं है; इसलिए सार्थक प्रयास का विरोध होगा
कितने हिंदू समाज मैं लोग हैं, जो की ‘कुछ गलत’ धर्मगुरुजनों, तथा हिंदू समाज के अंदर जो शोषण करता हैं, उनके द्वारा जो गलत कार्य हो रहा है, उसका विधीवध विरोध कर रहे हैं|
विधिवद विरोध का अर्थ है की ऐसे सकारात्मक प्रयास जिससे आज नहीं तो कुछ समय पश्यात, समाज कर्मठ होकर, हर गलत और शोषण पूर्ण कार्य, जो समाज को गुलामी की तरफ ले जा रहा हैं , उससे लड़ने की क्षमता विकसित कर सके; ध्यान रहे: क्षमता विकसित कर सके|



सनातन धर्म का अति प्राचीन हो कर भी जीवित रहने का कारण


REASONS FOR SANATAN DHARM SURVIVING FOR SUCH AN ABNORMAL LONG PERIOD~~ जब से पृथ्वी पर श्रृष्टि उत्पन्न होई है, तभी से सनातन धर्म भी है, परन्तु कारण क्या है कि इतना प्राचीन हो कर भी यह प्रभावी और प्रिये धर्म है
यह तो सर्व विदित है कि सनातन धर्म अत्यंत प्राचीन है, कबसे है यह, किसी को नहीं मालूम| अनुमान है कि जब से पृथ्वी पर श्रृष्टि उत्पन्न होई है, तभी से सनातन धर्म भी है| परन्तु कारण क्या है कि इतना प्राचीन हो कर भी यह प्रभावी और प्रिये धर्म है| ऐसी भी मान्यता है कि किसी भी धर्म का विश्व मैं ३००० वर्ष से ज्यादा जीवित रहना संभव नहीं है, जबकि सनातन धर्म कितना प्राचीन है, यह तक किसी को पता नहीं| लोग भावनात्मक कारण तो बताते है, कि यह धर्म इतना प्राचीन क्यूँ है, लकिन उससे तो कुछ होता नहीं; पाठकों को सही कारण चाहिये|


हिंदू धर्म में अवतार के कारण


THE REASON FOR AVATARS IN SANATAN DHARM is that HINDUS BELIEVE IN EVOLUTION AND DO NOT BELIEVE IN CREATION
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
जब-जब धर्म की हानि होती है, तब मैं धर्म की संस्थापना के लिए पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में अवश्य अवतरित होता हूं  श्री कृष्ण, गीता मैं
पोस्ट ‘अवतार की परिभाषा’ पर काफी पाठकों के जिज्ञासा पूर्ण प्रश्नों से काफी उत्साह बढ़ा|
यह पोस्ट इसलिए आवश्यक हो गयी क्यूंकि ईमेल के माध्यम से और अनेक सोसिअल सीट्स पर निम्लिखित प्रश्न बार बार आ रहे हैं|


क्या अवतार के पास अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति होती हैं ?


यहाँ युगों की अवधी देना इसलिए आवश्यक हो गया था, ताकि आप इस बात को समझ सकें कि श्रृष्टि बीच बीच मैं बुरे और बहुत बुरे वक्त से भी गुजरती है| आवश्यक है कि मनुष्य रूप मैं अवतार के संधर्भ मैं ‘बुरे वक्त’ और ‘बहुत बुरे वक्त’ को परिभाषित भी कर दिया जाए|
बुरा वक्त: जब अनेक कारणों से धर्म की हानि होती है, परन्तु समाज विज्ञानिक तौर पर पूरी तरह से विकसित नहीं होता, तो मनुष्य रूप मैं इश्वर के अवतार की आवश्यकता नहीं पड़ती है, या बहुत ही सीमित कार्य के लिए प्रभु अवतरित होते हैं, जैसे नरसिंह अवतार, हिर्नाकश्यप के वध के लिए, वामन अवतार, आदि...


भीष्म, सत्यवती के अनुरोध पर व्यास कुरु-वंश की प्रगति मैं सहायक बने


महाराज शांतनु, सत्यवती से शादी उपरान्त अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाए, और विचित्रवीर्य के जन्म उपरान्त कुछ समय बाद चल बसे| चित्रांगद सिंघासन पर विराजमान हुए, परन्तु अधिक समय तक वे शासन नहीं कर पाए, और एक मल-युद्ध मैं मारे गए| युवा अवस्था मैं विचित्रवीर्य को राज सिंघासन पर बैठा दिया गया, और स्वंम भीष्म ने राज्य का उत्तरदायित्व संभाला|
विचित्रवीर्य शारीरिक रूप से कमजोर थे, और बीमार से रहते थे| इधर यह बात पहली पोस्टों मैं भी कही गयी है, कि उस समय कन्याओं का अभाव था, और ऐसे मैं राजा विचित्रवीर्य को विवाह उपयुक्त कन्या मिलनी दुर्लभ थी| उस समय की कन्याओं की दुर्दशा के बारे मैं आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भीष्म, काशी नरेश के यहाँ गए और उनकी तीनो राज-कन्याओं को विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए, जिनके नाम थे अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका| 


कुछ अज्ञात लघु तथ्य माता सीता से सम्बंधित


SOME UNKNOWN FACTS ABOUT MATA SITA
अग्नि परीक्षा और सीता का त्याग, सम्बंधित घटना हैं| श्री राम ने माता सीता का त्याग, राजा बनने के उपरान्त, अग्नि परीक्षा के परिणाम को अस्वीकार करके किया
जनवरी १९८९ का महीना था, और मैं इलाहाबाद, महा-कुम्भ के दर्शन हेतु ही पंहुचा था| चुकी इलाहाबाद में ही पैदा और बड़ा हुआ था, इसलिए मुख्य नहान, जैसे की मकर संक्रांति और मौनी अमावस्या पर संगम मैं दुबकी लगाना बंद था, और उसकी वजह थी अत्यंत ही ज्यादा भीड़, इन पर्वो पर|
परन्तु मैं इन यात्राओ मैं नित्य कुम्भ मेले मैं अवश्य जाता था, सिर्फ उस भव्य मेले का अंग बनने के लिए| हिंदू संस्कृति मैं इतना है की आप सिर्फ इस सांस्कृतिक मेले मैं पहुच जाईये, जुड आप स्वंम जायेंगे|


शांतनु की सत्यवती से शादी मानव हित मैं एक समझोता था


MARRIAGE OF SHANTANU WITH SATYAWATI WAS TO OFFICIALLY TELL THE WORLD THAT HE PREFERRED NATURAL PROCESS OF CHILD REARING INSTEAD OF HUMAN CLONING

MARRIAGE OF SHANTANU WITH SATYAWATI WAS TO OFFICIALLY TELL THE WORLD THAT HE PREFERRED NATURAL PROCESS OF CHILD REARING INSTEAD OF HUMAN CLONING
सत्यवती से शादी करके शांतनु यह सन्देश दे रहे थे कि मानव क्लोनिंग की बजाय वे प्राकृतिक तरीके से पैदा हुई संतान पसंद करते हैं
इससे पहले की पोस्ट मैं आपको यह बताया गया है कि महामुनि पराशर ने सत्यवती से, सिर्फ संतान पाने हेतु विवाह करा, तथा सत्यवती से उन्हें सकुशल संतान जब हो गयी, तो समझोते के तहत दोनों शादी को निरस्त करके अलग हो गए;
उधर दूसरी तरफ महाराज शांतनु एक ऐसी स्त्री/कन्या की खोज मैं थे, जो उन्हें प्राकृतिक तरीके से संतान दे सके| शांतनु पूरी तरह से मानव क्लोनिंग के विरुद्ध थे, और उन्होंने मजबूरी मैं मानव क्लोनिंग द्वारा देवव्रत को अपनी संतान के रूप मैं पाया, परन्तु इस बात का विशेष ध्यान रखा कि मानव क्लोनिंग के समय, देवव्रत पूरी तरह से उनके आज्ञाकारी पुत्र रहें, और उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि उसमें उन्हें सफलता भी मिली थी| 


महामुनि पाराशर ने संतान हेतु सत्यवती से विवाह करा


MAHAMUNI PARASHER MARRIED SATYAWATI FOR HAVING A SON
महामुनि पराशर महान ज्योतिष-आचार्य थे जिनकी वेदान्त ज्योतिष से सम्बंधित पुस्तके आज भी समस्त वेदान्त ज्योतिष का आधार हैं | वे बहुत ही सहज स्वभाव के थे और जन कल्याण के अतिरिक्त उनकी और कोइ भी इच्छा नहीं थी| इसलिए किसी तरह के कपट और स्त्री लोभ की बात जो कुछ पुस्तकों मैं उनके बारे मैं कही गयी हैं, वे गलत हैं| वे शकुन , लक्षण के भी महान ज्ञाता थे |जरा सोचीये आज ५००० वर्ष बाद भी उनकी पुस्तके वेदान्त ज्योतिष का आधार हैं , तो उस समय उनकी ख्याति क्या होगी? हर प्रथिष्टित धनवान व्यक्ति, राजा महाराजा उनके सामने नव मस्तक होते थे , ऐसा मैं उनके विरुद्ध कोइ भी आरोप लगाते समय कुछ तो समझ का इस्तेमाल होना चाहिए|


हिंदू ज्ञान के अनुसार युगों का निर्माण आप कैसे करेंगे


HOW TO CONSTRUCT YUGS AS PER HINDU GYAN
युगों का निर्माण आप स्वंम  इसलिए करें , ताकी आपको यह सच तो पता पड़े कि कौन सा युग मानवता के लिए अच्छा है और कौन सा मानवता के लिए खराब| अभी तक तो आपको जो बता दिया गया है , वह आपने मान लिया कि सतयुग सबसे अच्छा युग था, और कलयुग सबसे खराब, जब की सच्चाई यह है कि सतयुग सबसे खराब युग था , और कलयुग सबसे अच्छा| आज के सूचना युग मैं यह सहज भी है , तो कमसे कम खुद तसल्ली तो कर लीजीये कि सही क्या है |
ध्यान रखीये यहाँ आप वही ज्ञान इस्तेमाल करेंगे जो सनातन धर्म मैं बताया गया है , और वैसे भी हिंदू धर्म के बाहर कोइ युगों को मानता नहीं है , और चुकी हमारे धर्म गुरुजनो ने केवल हिंदू समाज को ठगने के लिए युगों का प्रयोग करा है , और युगों को भौतिक आधार पर आज तक परिभाषित तक नहीं करा है , इसलिए आपसब के प्रयास के बिना हिंदू धर्म के बाहर लोग इसे मानेंगे भी नहीं |


एक सन्देश ..क्यूँ पालन कारक स्वरुप इश्वर का अवतरित होता है

WHY ONLY LORD VISHNU COMES AS AVATAR TO MAKE CORRECTIONS.
यह एक ऐसा विषय है जिसके बारे मैं पता तो सबको है , लकिन ऐसा क्यूँ इसके बारे मैं कभी किसी ने गंभीरता से सोचने का प्रयास नहीं करा |
नई श्रृष्टि का आरम्भ होता है सतयुग से, और चुकी सतयुग मैं पुरानी श्रृष्टि के कुछ लोग भी आ जाते हैं , मनु के साथ , तो सतयुग मैं नई श्रृष्ट के साथ साथ पुराने युग के मनुष्य, जिनमें राक्षस , अथार्थ मनुष्य का मॉस खाने वाले . और आर्य(आर्य वास्तव मैं राक्षस शब्द के रा को उल्टा कर के बनाया गया है , चुकी राक्षस की प्रवति आम मनुष्य से उलटी थी) भी सम्मलित हैं| आर्य और राक्षस के सतयुग मैं मौजूद होने से श्रृष्टि को लाभ भी होता है और हानि भी| पढीये : कलयुग का अंत..एक नए कल्प का प्रारम्भ और मत्स्य अवतार


ऑपरेशन गंगा- एक गंभीर प्रयास महाराज शांतनु द्वारा संतान पाने के लिए http://awara32.blogspot.in/2012/11/blog-post_28.html

लकिन अब महाराज शांतनु हस्तिनापुर पर राज्य कर रहे थे | उनके सामने जटिल समस्या यह थी की अपने वंश को कैसे आगे बढाएं , तथा उनकी हार्दिक इच्छा थी की उनकी संतान के अतिरिक्त राज्य का उत्तराधिकारी किसी और को मनोनीत नहीं करा जाए |ध्यान रहे इससे पहले महाराज भरत के समय मैं ऐसा हो चुका था की राज्य का उत्तराधिकारी बाहर से मनोनीत करा गया | लकिन विवाह योग्य कन्या और फिर संतान एक बड़ी समस्या थी | और महाराज शांतनु इसमें अपने को असफल होता देख रहे थे |हताश हो कर उन्होंने जेनेटिक इंजीनियरिंग और मानव क्लोनिंग का सहारा लिया | 


हिंदू समाज जब सशक्त होगा जब भारत का नेतृत्व एक हिंदू कर रहा होगा


नेतृत्व के लिए संकल्प और प्रतिबधता अति आवश्यक है, जो की अब तक दिखाई नहीं दिया है |
आप मैं से काफी लोगो ने इस ब्लॉग की पोस्ट पढ़ी होंगी, जो की बर्तमान सोच को चुनौती दे रही हैं, लकिन किसी ने उसे समझने का प्रयास नहीं करा | जबकी वह एक PROFESSIONAL प्रयास है , कर्महीन हिंदू समाज को कर्मठ बनाने के लिए, और रिजल्ट भी GUARANTEED है |
यह जरूरी नहीं है की आप उस विचार धरा से सहमत हो , लकिन यह अति आवश्यक है की आप अपने विचार खुल कर व्यक्त करें , और चर्चा करें ...वही सकारात्मक तरीका है आगे बढ़ने का , और शिक्षित होने का अपना दाइत्व निभाने का | लकिन ऐसा नहीं हो रहा है |


धर्म जो अग्नि परीक्षा को अधर्म घोषित करने पर मिलें

DHARM WE GET FROM DECLARATION OF AGNI PARIKSHA AS ADHARM
सनातम धर्म मैं अनेक समस्या हैं , और सबसे बड़ी समस्या यह है की यदि समाज विरोधी कहीं धर्म सिखाया जा रहा है , या बताया जा रहा है , तो किसी के पास कोइ विकल्प नहीं है , उसे सही करने का | कुछ ऐसा ही हो रहा है प्राचीन इतिहास के साथ , जिसमें रामायण का उद्धारण यहाँ दिया जा रहा है |
रामायण त्रेता युग का इतिहास है यह हम सब जानते हैं , और जब सुप्रीम कोर्ट मैं सारे हिंदू संघटनो ने अलग अलग यह हलफनामा लगा दिया की राम-सेतु मनुष्य निर्मित है , तो उसपर अब चर्चा की भी कोइ गुंजाइश नहीं है | परन्तु इतिहास की परिभाषा है तथ्यों के आधार पर वर्तमान समाज हित हेतु प्रस्तुतीकरण , जो की नहीं हो रहा है | यहाँ तक हो रहा है कि दुसरे युगों के मानव इतिहास से , अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियों की मिथ्या की चादर, जो इतिहास पर कस कर लपेटी हुई है , उसे भी हमारे धर्मगुरु हटाने को तैयार नहीं हैं |


धर्मगुरु समाज को राक्षस और असुर कि भिन्नता की सूचना तो दें


PLEASE INFORM SOCIETY THAT RAKSHAS AND ASUR ARE DIFFERENT
इक्कीसवी सदी सूचना युग कहलाती है , और सूचने के अनेक सोत्र उपलब्ध हैं |
यह पोस्ट इसलिए जरूरी हो गयी कि बहुत से लोग यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि यदि यह सत्य है तो यह सूचना हमें गुरुजनों से क्यूँ नहीं मिली | सारी प्रतिक्रिया तब शुरू होई जब इस विषय मैं एक पोस्ट ब्लॉग मैं आई ; लीजिए लिंक पर जा कर आप भी पढ़ें : धर्मगुरु समाज को यह तो बताओ कि राक्षस और असुर अलग हैं
एक प्रमुख कारण हमारी कर्महीन मानसिकता का यह भी है , कि हमारे धर्म गुरु, धन और शोषण के उद्देश हेतु, समाज तक सही सूचना नहीं पहुचने देते हैं | गुरुजानो का कम ज्ञान भी एक कारण है , की गलत सूचना समाज तक पहुच रही है |


धर्मयुद्ध मैं द्रोणाचार्य वध से पूर्व युधिष्टिर के असत्य को लेकर विवाद
SOME THOUGHTS ON HALF LIE YUDHISHTIR SPOKE TO FACILITATE DRONACHARYA’S DEATH
बचपन से अब तक एक बात सुनते आए हैं , की असत्य कितना घातक होता है | यह बिलकुल सच भी है , लकिन जब व्यक्ति आत्म निर्भर हो जाए और समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बन जाए तो उसे सत्य की पूर्ण परिभाषा भी समझानी चाहिए , जो धर्म गुरुओं का उत्तरदाइत्व है , लकिन ऐसा हो नहीं रहा है |
कुछ इसी परिपेक्ष मैं आज की चर्चा है |
धर्मयुद्ध/महाभारत पूरे विश्व को अपनी चपेट मैं लिए हुए था | तथा विषय भी अत्यधिक महत्वपूर्ण था | आगे मानव की पहचान क्या होगी?क्या वोह जेनेटिक इंजीनियरिंग और मानव क्लोनिंग द्वारा निर्मित एक मनुष्य होगा या प्राकृतिक विकास द्वारा , जो माता के गर्भ मैं पनपता है , और फिर नन्हे कृष्ण स्वरुप मैं नवजात शिशु के रूप मैं आपके परिवार का अंग बन जाता है


जेनेटिक इंजीनियरिंग और मानव क्लोनिंग महाभारत युद्ध के कारण


MAHABHARAT was fought as DHARM YUDH with KAURAVS favoring and accepting GENETIC ENGINEERING and HUMAN CLONING as DHARM, while PANDAVS rejecting the same and declaring NATURAL PROCESS OF CHILD REARING as DHARM. MAHABHARAT was the FIRST WORLD WAR.
विश्व की हर प्राचीन सभ्यता के इतिहास मैं एक विशाल विश्व-व्यापी बाढ़ का उल्लेख है जो की पृथ्वी पर करीब ७००० से १०००० वर्ष पहले आई थी | उस बाढ़ के उपरान्त विश्व मैं महिलाओं की कमी हो गयी , और नवजात शिशु के सफल पूर्वक पालन मैं भी समस्या होने लगी (अंग्रेज़ी मैं पढ़ें: THE GREAT FLOOD OF DWAPAR YUG AND THERE AFTER 

धीरे धीरे समाज प्रगति करता गया, लकिन उपरोक्त समस्या का समाधान नहीं हो पाया ; महिलाओं की कमी और शिशु के सफल पूर्वक पालन मैं कमी बनी रही | समाज की प्रगति के साथ विज्ञान ने भी इस समस्या के निदान के लिए अनेक प्रयत्न करे, और अंत मैं विज्ञान के अनुसार सबसे कारगर उपाय यह समझ मैं आया की जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग कर के ही इस समस्या का निदान हो सकता है | कुछ राहत हुई और विज्ञानिकों को आगे शोघ करने की अनुमति मिली| जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रयोग करके मानव क्लोनिंग भी शुरू हो गयी, और समाज आगे बढ़ता गया |


जब भीष्म पितामह ने मानवता कि विजय के लिए प्रतिज्ञा तोडी

यहाँ जो कहा जा रहा है , उसपर निर्णय आप स्वंम लेंगे, कोइ और नहीं ले सकता यह निर्णय आपके लिए | आप ही को फैसला करना है की भीष्म पितामह ने युद्ध भूमि मैं अपनी प्रतिज्ञा तोडी अथवा नहीं
WHY BHISHM PITAMAH BROKE HIS PRATIGYA DURING MAHABHARAT WAR
यह प्रसन अत्यंत महत्वपूर्ण है , इसलिए की इससे हिंदू समाज की प्रगति और भारतवर्ष की उनत्ति जुडी होई है | क्या भीष्म पितामह ने धर्म युद्ध मैं अपनी प्रतिज्ञा तोडी? अभी तक आपको यही बताया गया है की देवव्रत(भीष्म पितामह) ने अपने पिता के सुख के लिए भीष्म प्रतिज्ञा ली जो की दो भाग मैं थी :
1.       मैं ,देवव्रत , कभी विवाह नहीं करूँगा, और आजन्म ब्रह्मचारी रहने का प्रण लेता हूँ
2.       मैं देवव्रत,यह प्रतिज्ञा लेता हूँ की हस्तिनापुर के सिंघासन पर जो भी विराजमान होगा, उसमें अपने पिता की छबी देखूंगा , और इसी सोच से उनके सारे आदेश मान्य होंगे


हमें भक्त नहीं कर्मठ हिंदू समाज चाहिए

ARE WE MAKING ANY EFFORTS TO REVIVE HINDU SAMAAJ ...>>..OR...>>
IS HINDU SAMAAJ COMPLETELY IN THE HANDS OF EXPLOITERS WHO ARE ONLY TRYING TO MAKE HINDU SAMAAJ MORE PASSIVE AND TAKE IT TOWARDS ANOTHER SLAVERY?
यदि आप हिंदू समाज को सशक्त देखना चाहते हैं , तो बहुत सीमित विकल्प हैं; इसलिए समय क्यूँ लग रहा है , समझ मैं नहीं आ रहा है ?
पहला कदम यह सोच बनाने से शुरू होगा कि हिंदू धर्म का पहला, महत्वपूर्ण तथा पूरी तरह से अविवादित उद्देश, हिंदू समाज कि प्रमाणित आकडो के अंतर्गत उनत्ति है |
REPEAT > फिर से कह रहा हूँ >> हिंदू समाज कि प्रमाणित आकडो के अंतर्गत उनत्ति है ............यह हमारा पहला और परम उद्देश है |


देवों के देव इश्वर शिव और वैराग

DEVON KE DEV, BHAGWAAN SHIV is a VAIRAGI VAIRAAG means a man who is in total control of himself and HE could NEVER take any decisions on being  emotional. Yet our Dharm Gurus say that SHIV destroyed the entire creation after the death of SATI because HE became EMOTIONAL. IS THEIR A DEEPER CONSPIRACY HERE?

हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें की स्वंम भगवान विष्णु और श्रृष्टि रचेता ब्रह्मा जी की उत्पत्ति का उल्लेख है | लकिन भगवान शिव का उत्पत्ति का कहीं कोइ उल्लेख नहीं है | ऐसी मान्यता है कि जब ब्रह्माण्ड मैं समय की उत्पत्ति होई तभी भगवान शिव की भी उत्पत्ति होई | किसी भी व्यक्ति के लिए, कुछ भी कल्पना बिना समय के संभव नहीं है | यह हमारी सोच की सीमा से बाहर है | स्पष्ट है कि शिव का आंकलन समय को मापदंड बना कर नहीं हो सकता ; और कोइ मापदंड हमें आता नहीं है | संभवत: यही इश्वर की परिभाषा भी हो ?


धर्मगुरु समाज को यह तो बताओ कि राक्षस और असुर अलग हैं

HINDU RELIGIOUS LEADERS MUST TELL THE SOCIETY THAT RAKSHAS AND ASURS ARE DIFFERENT
आज का युग सूचना युग है | इन्टरनेट और कंप्यूटर के कारण सूचना हर विषय मैं सुलभता से उप्लभ्द है | आज धर्म गुरुजनों का यह प्रथम कर्तव्य है कि समाज को अधिक से अधिक सूचना उप्लभ्द कराएं | खेद की ऐसा हो नहीं रहा है ; और यह भी प्रमुख कारण है हिंदू समाज के कर्महीन होने के |
पुरानो मैं राक्षस और असुर दो का रह रह कर वर्णन है , परन्तु सूचना और परिभाषा के अभाव मैं दोनों को एक मान लिया गया है | साम्यता , सामंजस्य , सुर जो की किसी भी परिस्थिति  को पूर्णता की और ले जाता है , उसीके विपरीत शब्द हैं असाम्यता , असामंजस्य और असुर जो की किसी भी परिस्थिति को अराजकता की और ले जाते हैं | विज्ञान से जुड़े बुद्धीजन आपको यह बता सकेंगे की सुर और असुर दोनों की आवश्यकता होती है , किसी तरह के विकास के लिए; यहाँ तक की एक बच्चे को गर्भ मैं स्तापित होने से पैदा होने तक भी दोनों सुर और असुर का सही मिश्रण आवश्यक है |


क्या तुलसीदास कर्त रामचरितमानस महारिषि वाल्मीकि की रामायण का विरोध करती है...कदापि नहीं

हिंदू धर्म सर्वथा कर्मप्रधान धर्म रहा है ! कर्मवीर श्री कृष्ण का कर्मछेत्र  कहलाता है , जहाँ धर्म की परिभाषा कर्म की व्याख्या से शुरू होती है ! परन्तु समस्या इतनी जटिल थी की कर्मवीर हिंदू समाज बच नहीं सकता था ! वक्त इतना बुरा था कि विदेशी शासको से संघर्ष का अर्थ था हिंदू समाज कि समाप्ति ! यह तो हमसब को विदित है कि धर्म मैं सदैव उचित अनुपात कर्म और भावना का होता है ! बिना भावना या भक्तिरस के कर्म और कर्म प्रधान धर्म समझाया नहीं जा सकता ! लकिन अब समस्या यह थी कि कर्म प्रधान धर्म का कोइ प्रयोग नहीं था ! किसी तरह से कर्म का भाग घटा कर भावना(भक्ति) भाग बढ़ाना था

TULSIDAS IS WRONGLY BLAMED FOR DEPARTING FROM ORIGINAL TEXT OF HISTORICAL DETAILS MENTIONED IN VALMIKI’S RAMAYAN. HIS EFFORTS WERE HINDU SAMAAJ CENTRIC.


अवतार इश्वर से अधिक महत्वपूर्ण है हिन्दुओं के लिए

HINDUS DO NOT BELIEVE IN CREATION, THEY BELIEVE IN EVOLUTION; AVATARS AS SUCH ARE MORE IMPORTANT
सृजन या  क्रमागत उन्नति ? CREATION OR EVOLUTION ?
हिन्दू सृजन(CREATIONमैं नहीं , क्रमागत उन्नति(EVOLUTION मैं विशवास करते हैं ! इसीलिये अवतार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, हिन्दू धर्म मैं ! कितने हिन्दू श्री विष्णु की विधिवत पूजा, अर्चना करते हैं,? नहीं, वे श्री विष्णु  अवतार श्री राम और कर्मवीर श्री कृष्ण की पूजा अर्चना से ही श्री विष्णु को प्रसन्न करते हैं !

कारण स्पष्ट है, हिन्दू यह नहीं मानते कि पृथ्वी के विकास का कारण सृजन है, वे यह मानते है कि विकास स्वाभाविक रूप से हुआ है , और इश्वर अपने लोक मैं बैठ कर कभी कोइ हस्ताषेप नहीं करते ! यदि  कहीं सुधार  की आवश्यकता है , तो दोषनिवृत्ति के लिए इश्वर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं , और आवश्यक संशोधन/सुधार उपरान्त अपने लोक चले जाते हैं !
जब हिन्दुओं की आस्था स्पष्ट है , तथा राम और कृष्ण के गुणगान मैं समस्त हिन्दू समाज लगा हुआ है , तो इसपर धर्म गुरुजनों का स्पष्टीकरण क्यूँ नहीं आता ? क्यूँ बार बार स्रजन को महत्त्व दिया जाता है ?
यदि हिन्दू सृजन मैं आस्था रखते होते तो अवतार अर्थहीन हो जाता है ! ध्यान रहे इश्वर सर्वशक्तिमान है , इश्वर अपने लोक मैं बैठ कर आवश्यक सुधार पृथ्वी पर ला सकते हैं , फिर अवतार  क्यूँ ?
अवतार की सुधार करने की क्षमता सीमित होती है ! स्वंम श्री राम ने भी एकाधिक विवाह का विरोध करा, तथा नियम बनाया कि एक से अधिक पत्नी कोइ नहीं रखेगा , परन्तु उसे कभी भी धर्म की मान्यता नहीं दिला पाए !

मैं और मेरी संतान..चुकी हर व्यक्ति इश्वर का अंश प्रतिबिम्ब है

I CAN DISCHARGE MY OBLIGATIONS AS FATHER ONLY BY HONESTLY BEING AN AGENT OF GOD
सृजन इश्वर का कार्य है , की मनुष्य का | आपकी संतान आपको इश्वर की देंन है | उसका पोषण पूर्णता तभी संभव है जब आप इस विश्वास को धर करलें कि पोषण इश्वर का कार्य है , और मैं, इश्वर का, इस कार्य मैंप्रतिनिधित्व कर रहा हूँ |
आरम्भ मैं संतान को विशेष देख रेख की आवश्यकता होती है , जो कि आप और आपका परिवार खुशी खुशी पूरा करता है | उसके रोने का अर्थ होता है कि वोह तो कुछ बता नहीं पाता, इसलिए आप स्वंम ही समझने का प्रयास करते हो कि उसकी क्या आवश्यकता है , या कष्ट है , तथा अपनी समझ से उसका निवारण करते हो |
अब बालक - महीने का हो गया, और आप और आपका परिवार उसके भावों को कुछ कुछ समझने लगे हैं , आज भी वोह कुछ कह नहीं पाता , इसलिए उसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है |
अब बालक कुछ और बड़ा हो गया ; ठुमक ठुमक के चलने लगा | पोषण की मांग है कि उसे कुछ खतरों से सावधान कर दिया जाए , और वोह आप करते हैं | आग और चूल्हे के पास वोह जाए , इसका ध्यान रखा जाता है , उसे समझाया भी जाता ही कि उसे ऐसा नहीं करना है , और जरुरत पड़े तो झूट मूढ का नाटक भी करना होता है, उसे डाटने का |
बालक भी अब कुछ समझदार हो चला है | अपनी जिद वोह माता से मनवा लेता है और समस्या अपने पिता से | यदि कोइ खिलौना उसका खराब हो जाए तो उसे विश्वास है कि उसके पिता उसे ठीक कर देंगे , या कुछ नया दे देंगेऔर अब तक ऐसा हुआ भी| इस बालक को यह विश्वास हो चला है कि उसकी हर समस्या का समाधान उसके पिता के पास है , परन्तु आज जब खिलौना टूट गया और वह अपने पिता के पास उसे ठीक कराने के लिए पंहुचा , तो पिता समझ गए कि यह ठीक नहीं हो सकता , और उसका ध्यान बाटने के लिए उसे कुछ नए काम मैं उलझाने से ज्यादा जरूरी था उसे बताना कि उसके पिता वास्तव मैं उसकी सारी समस्या का समाधान नहीं कर सकते | “यह खराब हो गया है , अब ठीक नहीं होगा , उसके पिता ने बताया | बालक रोया , और पिता ने उसे रोने दिया | उसे आज पहली बार अहसास हुआ कि उसके पिता उसकी सारी समस्या का समाधान नहीं कर सकते |

त्रेता युग के वैज्ञानिक विकास का मूल्यांकन आज के विकास के संदर्भ मैं

गंभीर समस्या यह है कि यदि वर्तमान हिंदू समाज के लाभ के बारे मैं सोचना है तो रामायण को इतिहास समझना पड़ेगा, और समस्त चरित्रों का वर्णण बिना अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियां के करना होगा, तभी उस समय के विज्ञान का लाभ समाज को मिलेगा , लकिन इसके लिए हमारे धर्म गुरु तैयार नहीं हैं |
यदि आपको वास्तव मैं त्रेता युग का विज्ञान समझना है तो अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियां अलग करके ही त्रेता युग के विज्ञान को समझा जा सकता है , तथा इससे वर्तमान समाज का अत्यधिक लाभ भी है , परन्तु ऐसा क्यूँ नहीं हो रहा , यह प्रश्न आपको समाज के सामने बार बार रखना चाहियें |अगर अपने वर्तमान समाज के हित मैं आप इतना भी नहीं कर रहे हैं तो यह अधर्म है |
आज, हमें समय लगेगा उस समय के विज्ञान तक पहुचने मैं | प्रलय स्वरूप, विनाशकारी(WEAPON OF MASS DESTRUCTION) अस्त्रों का विघटन शुरू हो चूका था , जो की हमारे यहाँ अभी नहीं हो पा रहा है | कष्ट इस बात का है की हमारे धर्म गुरु ही नहीं चाहते की हिंदू समाज आगे आए |
सिर्फ रामायण और महाभारत से अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियां अलग करके समझा जाए तो हिंदू समाज के युवा विद्यार्थीयों को शोघ के लिए प्रेरणा मिलेगी और सफलता भी |


सोचिये समझिये और समाज मैं जागरूकता लाईये

READ THINK UNDERSTAND AND WORK FOR CORRECTION IN HINDU SOCIETY
1.             सबसे सरल परिभाषा धर्म की यह है कि :
धर्मपुस्तकों से प्ररित हो कर धर्मगुरु द्वारा वर्तमान समाज के लिए बनाए गए नियम, जिनका पालन करने से व्यक्ति और समाज प्रगति कि और अग्रसर होता है , पनपता है, तथा इश्वर पर आस्था बनी रहती है |
2.             रामायण तथा प्राचीन हिंदू इतिहास भक्ति भाव मैं इसलिए उपलब्ध है क्यूँकी बीते हुए वक्त मैं हिंदू समाज अनेक कठिन परिस्थितियों से गुजरा है, और तब वास्तविक धर्म का पालन संभव नहीं था, तब धर्म को मानने वाले हिंदू समाज की पतन से रक्षा ज्यादा आवश्यक थी, लकिन आज क्या हो रहा है, आज धर्म पालन से समाज प्रगति कि और क्यूँ नहीं अग्रसर है ?
कृप्या यह गलत जवाब न दें कि समाज धर्म का पालन नहीं कर रहा है | प्रमाणित आकडे बताते हैं कि हिंदू समाज का धार्मिक कार्य मैं व्यय आजादी के बाद बढा है , और अनेक टीवी चैनल(MULTIPLE TV CHANNELS) के आने के बाद तो बहुत तेज़ी से बढा है |
3.             पिछले १५०० वर्षों मैं उत्पीडन हिंदू समाज के शासकों द्वारा शोषण के कारण, हिंदू समाज अपने को समेट कर अंदर की तरफ सुकुड गया है , फिर और ज्यादा उत्पीडन, शोषण, तथा और ज्यादा सिमटना और सुकुड़ना, तथा यह क्रम अनेक बार हुआ, जिसका परिणाम है हिंदू समाज पूरी तरह से कर्महीन हो गया है , और आजाद हिन्दुस्तान के धर्म गुरुजनों का यह कर्तव्य है कि इस विचारधारा को बदलें |
4.             समझने की बात यह है कि सनातन धर्म कि माने तो अपने लोक मैं बैठे इश्वर कभी भी इस कार्मिक संसार मैं हस्ताषेप नहीं करते | जब इश्वर को हस्ताषेप करना होता है तो वे पृथ्वी पर अवतरित होते हैं , और तब आवश्यक सुधार या दिशा परिवर्तन करते हैं | स्पष्ट है कि अवतरित होने के उपरान्त इश्वर आलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं का प्रयोग नहीं करते ; क्यूंकि इश्वर तो सर्वशक्तिमान है , आलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं का प्रयोग तो वे अपने लोक मैं बैठ कर भी कर सकते हैं , वे अवतार के रूप मैं पृथ्वी पर क्यूँ आयेंगे ?
5.             धर्म का सीधा सम्बन्ध समाज से होता है | प्रमाणित आकडे बता रहे हैं कि हिंदू समाज गरीबी और बर्बादी की और बढ़ रहा है , जब की धर्म गुरु जानो कि आर्थिक स्थिति मैं जबरदस्त सुधार हुआ है | सीधा अर्थ है समाज का शोषण हो रहा है | फैसला आप करें कि वास्तिवकता क्या है |


अवतार की परिभाषा 
http://awara32.blogspot.com/2012/06/blog-post_11.html 

“अवतार , या तो दर्शाते हैं , या उपलब्ध कराते हैं,  ऐसी परिस्थिती जिसमें मानव के जीवित रहने मैं उल्लेखनीय सुधार हो | मनुष्य रूप मैं अवतार अवतरित हो कर आवश्यक सुधार मानवता की प्रगति के लिए लाते हैं , जब , जब की मानवता अत्यंत संकट मैं हो | और भौतिक प्रयास समाज की प्रगति के लिए जो करा जाता है , वह धर्म है”
EVOLUTION REQUIRES AVATAR NOT GOD TO MAKE CORRECTIONS
अवतार का क्या सही अर्थ है, यह जानना अत्यंत आवश्यक है , क्यूंकि सूचना युग मैं हिंदू समाज को अगर आगे आना है , तो परिभाषा तो सबकी सही होनी चाहिए , और परिभाषा भी ऐसी, जो सम्बंधित समस्त प्रश्नों का भौतिक स्तर पर उत्तर दे सके | ध्यान रहे भौतिक स्तर पर , न की भावनात्मक स्तर पर | खेद का विषय यह है कि अभी तक अवतार कि कोइ परिभाषा ही नहीं है |
समस्या यह भी है कि हमारे धार्मिक ग्रन्थ इतने अधिक हैं , कि उनका उपयोग समाज के शोषण के लिए करना ज्यादा लुभावना है, और वही हो रहा है | यदि , स्पष्टीकरण हर विषय पर , समाज को केन्द्र बिंदु मान कर करा गया , तो शोषण समाप्त हो जाएगा , और यह धर्म गुरु नहीं चाहते |
एक उद्धरण उपयुक्त रहेगा | मत्स्य अवतार का उल्लेख है , जो कलयुग के अंत में , जब पृथ्वी पूरी तरह जलमग्न हो जाती है , तो इस युग के कुछ लोगो को, अगले महायुग मैं ले जाने मैं सहायक सिद्ध होता है | पुरानो की माने तो ‘अंतराल’ अथार्थ बीच का समय , यानी की वर्तमान कलयुग का अंत और नए महायुग के शुरुआत की दूरी ७,२०,००० वर्ष की है | इतने लंबे समय मैं , जब पृथ्वी जल-मग्न हो, तो भोजन का अभाव और समुन्द्र पर रहने की क्या अवश्यकताएँ हो सकती हैं , कोइ नहीं बताता, लकिन अनुमान हर व्यक्ति लगा सकता है | समुन्द्र का जल भी स्थिर था , तथा जल-जीवन भी समाप्त हो गया था | केवल भारत , जो जलमग्न था, उसके ऊपर जल मैं कुछ जीवन शेष था, और मछलियाँ दिखाई देती थी |


दक्ष का श्रृष्टि यज्ञ जिसमें सती ने प्राणों की आहुति दे दी 
http://awara32.blogspot.com/2012/06/blog-post.html

DEVON KE DEV-MAHADEV ;
SHRISHTI YAGYN OF DAKSH ..REASON FOR SATI SACRIFICING HER LIFE THERE
“मेरे इश्वर, शिव और सती, संसार कि श्रृष्टि के सकारात्मक प्रगति मैं सदेव रुचिकर हैं , और वचनबद्ध हैं ; तथा वे श्रृष्टि का विनाश भावनात्मक कारणों से नहीं कर सकते | इतना विश्वास तो आपको भी अपने इश्वर पर होना चाहिए, नहीं तो हिंदू समाज का शोषण समाप्त नहीं होगा | याद रहे, ऐसा घृणित कार्य तो राक्षस ही कर सकते हैं , इश्वर कदापि नहीं”
सबसे पहले हम यज्ञ का अर्थ समझते हैं | यज्ञ का अर्थ होता है ‘सामूहिक कठोर प्रयास’ | यज्ञ, जो कि संस्कृत का शब्द है उसके लिए यह गलत धारणा अपने दिमाग से निकाल दीजीये कि यज्ञ का अर्थ होता है ‘अग्नि के सामने बैठ कर आहुति देना’ | उसी प्रकार ‘तप’ के लिए भी गलत धारणा है कि तप का अर्थ होता है सब कुछ भूल कर वन मैं जा कर , तथा सब कुछ त्याग कर इश्वर की कठोर और निरंतर अराधना ;  नहीं तप का अर्थ होता है ‘व्यक्तिगत कठोर प्रयास’ |
DEVON KE DEV-MAHADEV(देवो के देव महादेव), एक लोकप्रिय सीरियल है, जो LIFE OK ,  TV CHANNEL पर दिखाया जा रहा है | जैसा की हर धार्मिक सीरियल मैं होता है , प्रयास हर सीरियल मैं इस बात का करा जाता है कि भावनात्मक तरीके से दर्शक को इस सीरियल से जोड़ा जाए, ताकि सीरियल से होने वाला आर्थिक लाभ अधिक से अधिक हो सके | इसमें कोइ बुराई भी नहीं है, व्यवसाय मैं ऐसा होता भी है , लकिन हिंदू धार्मिक गुरुजनों की यह नैतिक जिम्मेदारी तो है, कि हिंदू समाज को यह बताएं कि यह यज्ञ किस कारण हो रहा था, जहाँ सती ने देह त्याग दी |
सबसे पहले तो आपको यह भूलना होगा कि सती के देह त्यागने के कारण भावनात्मक थे |  सती जगत जननी भी हैं , तो जो आपको बताया जा रहा है कि सती का देह त्यागने का कारण भावनात्मक है उसे आपने अस्वीकार क्यूँ नहीं करा ? क्या इश्वर श्रृष्टि का विनाश मात्र भावनात्मक कारण से कर सकते थे | क्या इश्वर श्रृष्टि का विनाश मात्र इस कारण से कर सकते हैं की उनकी पत्नी ने देह त्याग दी ? नहीं कभी नहीं | ऐसे भगवान की कम से कम मैं तो पूजा नहीं करूँगा; और मेरे भगवान ऐसा ‘राक्षसी कार्य’ कर भी नहीं सकते, कि ‘पति के अपमान’ के कारण से सती ने देह त्याग दी और शिव रुष्ट हो गए , जिससे प्रलय आ गयी | वैसे भी भावनात्मक कारणों से देह त्यागना अधर्म है और यह हर धर्म बताता है |माता सती ने भावनात्मक कारणों से देह नहीं त्यागी |


हनुमान बंदर नहीं वन मैं उत्पन्न मनुष्य की नई प्रजाति से थे
http://awara32.blogspot.com/2012/05/blog-post_28.html
 
Hanuman WAS NOT A MONKEY BUT EVOLVED HUMAN CALLED VAANAR
वानर, जैसा कि शब्द से स्पष्ट है , वह वन + नर से बना है , जिसका अर्थ है; “वन मैं उत्पन्न हुआ मनुष्य” | वानर मनुष्य की नई प्रजाति थी जो कि स्वाभाविक रूप से श्रृष्टि के विस्तार मैं वन मैं उत्पन्न होई , उनके पूछ थी , और मनुष्यों की तरह से ही उन्होंने छोटे छोटे कसबे वन मैं बना रखे थे | वे बंदर कदापि नहीं थे |
क्या कारण था कि हनुमान के पिता केसरी, वानरों के एक राजा थे, लकिन हनुमान उनकी संतान हो कर राज्य के उत्तराधिकारी नहीं हो पाए ? केसरीनंदन तो हैं लकिन राज्य के उत्तराधिकारी नहीं हो पाए | यह प्रश्न आपने पुछा कभी ?
क्या कारण था कि हनुमान हमेशा चुप चुप रहते थे, कम बोलते थे ?
क्या कारण था कि हनुमान ने बाल ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करा ?
 क्या कारण है कि हनुमान पवनपुत्र और पवनकुमार भी कहलाते हैं ?
इन सब प्रश्नों का भावनात्मक उत्तर आपको अलग अलग विभिन् लोगो से मिला होगा , लकिन सही उत्तर आपके पास नहीं है | क्यूँ ? ध्यान रहे सही उत्तर वह है जो कि यदि किसी भी व्यक्ति को हनुमान का केवल इतिहास बता दिया जाय, तो वह स्वंम उत्तर खोज ले |


त्रेता युग के इतिहास रामायण पर से मिथ्या की चादर हटाएँ
http://awara32.blogspot.com/2012/05/blog-post_21.html

कुछ लोगो का विरोध है, तथा कुछ लोग का मत है कि संभवत: धार्मिक इतिहास साधारण इतिहास से हट कर है , तथा उसमें चमत्कारिक और आलोकिक शक्ति हो सकती हैं , तथा कुछ लोग कह रहे हैं कि त्रेता युग मैं लोगो के पास ऐसी शक्तियां थी | विरोध इस बात का है कि पोस्ट उनके इष्ट, प्रभु श्री राम की चमत्कारिक और आलोकिक शक्तियों को चुनौती दे रही है जब की वे भगवान हैं |
समझना आपको यह है कि इतिहास कि परिभाषा क्या है ? तथा क्यूँ रामायण और महाभारत को दूसरा वेद कहा गया है ?
इतिहास की परिभाषा शुरू से यही रही है कि वर्तमान समाज के हित को ध्यान मैं रख कर तथ्यों की प्रस्तुति | इसका जीता जागता उद्धारण है कि एक ही इतिहास हिंदुस्तान, पाकिस्तान और बंगलादेश का है, लकिन तथ्यों की प्रस्तुति ने तीनो देशों मैं इसका स्वरुप अलग कर दिया है |
अब उत्तर आपको देना है | मैंने सारे तथ्य आपके समक्ष रख दिए | ध्यान रहे चमत्कारिक और आलोकिक शक्तियों समाज को  भावनात्मक ढंग से रिझाने का तरीका है , जो कि आजादी से पहले खूब प्रयोग मैं लाया गया है , क्यूंकि उस समय हिंदू समाज को बचाने का एक मात्र विकल्प यही था | उस समय हिंदू समाज सर झुका के और कर्महीन हो कर ही अपने समाज को बचा पाया, लकिन आज क्यूँ ?

वनवास के दौरान राम ने वानरों को नागरिक और सैन्य प्रशिक्षण दिया
http://awara32.blogspot.in/2012/05/blog-post_18.html 

SHRI RAM TRAINED VAANARS, DURING HIS STAY IN FOREST ABOUT CIVIL LAWS AND ALSO IMPARTED MILITARY TRAINING FOR EFFICIENT USE OF THE THEN WEAPONRY
आज़ाद भारत, जो श्री राम को तरह तरह से पूजता है , वह यह कैसे स्वीकार करलेता है कि समस्त क्लेश का नाश करने वाले श्री राम के स्वंम के निवास पर कोइ विघ्न बाधा , वह भी माता सरस्वती , हेरफेर कर के उत्पन्न कर सकती थी ? संभवत: यह कुछ उसी प्रकार है , जिस तरह से शोषण का विरोध न हो पाय , इसलिए समाज को पूरी तरह से यह समझाया जा रहा है कि कलयुग सबसे खराब युग है और सतयुग सबसे अच्छा युग | जबकी सत्य ठीक इसका उल्टा है |
सत्य तो यह है की यह संभव ही नहीं है | इसके दो कारण है , एक भौतिक और एक भावनात्मक |
तथ्य यह है कि कैकई ने राम के लिए वनवास कि मांग करी | यह इतिहासिक  तथ्य है | अब व्याख्या का प्रयोग करके आप इसमें कुछ जोड़ सकते हैं , जैसे कि मंथरा की बुद्धी माता सरस्वती भ्रष्ट कर गयी |लकिन व्याख्या का प्रयोग जो आजादी से पहले हुआ है, वह आज के समाज के लिए उपयुक्त है कि नहीं यह तो सोचना पडेगा |
आज के समाज को इससे नुक्सान ही नुक्सान है | तो फिर हम क्यूँ तथ्यों को जोड़ तोड़ के समाज के सामने रख रहे हैं ? ध्यान रहे रामायण जो कि इतिहास है , वह उस समय की एक झलक भी दिखाता है | विश्व उस समय अत्यंत विकसित था, उस समय विमान भी थे ; संषेप मैं आज का समाज उस समय के इतिहास को ग्रहण करने की क्षमता रखता है | तो फिर समाज का नुक्सान , तथ्यों का हेर-फेर कर के क्यूँ किया जा रहा है ?

नरसिंह अवतार.. क्रमागत उन्नति की प्रक्रिया से उत्पन्न मनुष्य
http://awara32.blogspot.com/2012/05/blog-post_14.html 

NARSINGH WAS AN EVOLVED HUMAN AND NOT GOD WHO EMERGED FROM PILLAR
“श्रृष्टि के सकारात्मक उनत्ति के लिए भगवान विष्णु का वानर प्रजाति मैं, नरसिंह के रूप मैं अवतरित होना , यह उदहारण स्थापित करता है ,  कि समाज मैं विषमता को दूर करने के लिए पिछड़ा वर्ग जो प्रयास करे वह सदेव सराहनीय है , इश्वर अवतार नरसिंह की तरह पूजनीय है | उसका सम्मान होना चाहिए विकसित मनुष्य वर्ग द्वारा”
यह पोस्ट अनेक जिज्ञासु प्रश्नकर्ताओं के फल स्वरुप आवश्यक हो गयी थी |
प्रश्नकर्ताओं की जिज्ञासा इस विषय मैं है कि लोक-प्रिय पोस्ट : “ हिंदू इतिहास ...सत्ययुग में इश्वर अवतार ” लिंक : http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post.html  मैं यह बात कही गयी है की नरसिंह वानर प्रजाति के वन मैं विकसित मनुष्य थे , जिन्होंने हिरणकश्यप का वध किया ! नरसिंह का मुख सिंह जैसा था ! आज भी हम नरसिंह को विष्णु अवतार मानते है !
कुछ पाठकों का कहना है कि नरसिंह अवतार तो खम्बे से प्रकट हुए थे, तो इस तथ्य को क्यूँ बदला जा रहा है , तो कुछ समर्थक कारण जानना चाहते है | इस कथन के कारण बहुत साधारण हैं , इश्वर और अवतार के बीच मैं जो अंतर है उसकी परिभाषा के अभाव मैं यह भ्रान्ति है |


रामायण इतिहास है या धार्मिक ग्रन्थ
http://awara32.blogspot.in/2012/05/blog-post.html
IS RAMAYAN HISTORY OR RELIGIOUS TEXT
इस प्रश्न का उत्तर, चर्चा मैं लोग अपनी सुविधा अनुसार दे देते हैं |
परन्तु जब हिंदू समाज कर्महीनता की हद छु रहा है, तब आवश्यक हो जाता है कि हर प्रश्न का सही उत्तर समाज के पास हो |
पहले हिंदू शास्त्रों के अनुसार धार्मिक ग्रन्थ और इतिहास मैं अंतर समझते हैं | पहले यह समझ लें कि सनातन धर्म मैं प्रमुख तीन प्रकार के पाठ्य पुस्तक हैं |
1.    वेद
2.    उपनिषद
3.    पुराण
वेद और उपनिषद धार्मिक ग्रंथो मैं आती हैं ; प्राचीन होते हुए भी उनमें , विशेषज्ञों के मत माने तो, कोइ विशेष संशोधन , या अंतर्वेषण नहीं हुआ है | धार्मिक ग्रंथो का अलग अलग समय मैं नवीन संस्करण भी नहीं आये हैं |
परन्तु रामायण के साथ ऐसा कुछ नहीं है | हिन्दुस्तान के हर प्रान्त मैं उसका अलग संस्करण उपलब्ध है; यहाँ तक कि विदेशो मैं भी उसके अलग संस्करण हैं | इतिहास के साथ ऐसा स्वाभाविक भी है |
इतिहास कि परिभाषा ही है , कि तथ्योँ की प्रस्तुति उस समय के शासक और जनता के इच्छा अनुकूल |


मर्यादा हीन पुरुष और मर्यादापुरुषोत्तम राम मैं अंतर
http://awara32.blogspot.in/2012/04/blog-post_29.html

DIFFERENCE BETWEEN MARYADAHEEN PERSON AND MARYADAPURUSHOTTAM RAM
अनेक प्रश्न इस विषय को लेकर सामने आ रहे हैं ; सबसे ज्यादा प्रश्न इस कथन के साथ कि वनवास मैं राम के पास अयोध्या से सेना बुलाने का कोइ विकल्प नहीं था |

ध्यान रहे यदि श्री राम की चरण पादुका अयोध्या के सिंघासन पर विराजमान थी , और सीता को वनवास दिया नहीं गया था , तो अयोध्या का उत्तरदायित्व सीता कि रक्षा के प्रति पूर्ण था, इसमें कोइ संदेह नहीं है |

फिर भी इसे दुसरे दृष्टिकोण से देखते हैं |

यह पोस्ट “राम सुग्रीव मैत्री संधि .एक विश्लेशण” को लेकर जो प्रश्न और जिज्ञासा उठ रही है उसका जवाब देना का प्रयास है |

श्री राम ने बालि, सुग्रीव मल युद्ध मैं , बाहर से, एक पेड के पीछे से तीर मार कर, निर्णायक हस्तक्षेप करा , और बालि प्राणघातक अवस्था मैं पहुच गए |अब आपको इस प्रश्न का उत्तर देना है :
क्या बाहर से हस्तक्षेप करने वाला यह कार्य किसी भी उत्तरदायी/जिम्मेदार, राजा/राजकुमार को शोभा देता है ? क्या यह कार्य उस व्यक्ति को मर्यादाहीन पुरुष कहलाने के लिए पर्याप्त नहीं है ?
उत्तर चाहे आप दे या मैं, उत्तर एक ही है ; जी हाँ, केवल यह कार्य उस व्यक्ति को मर्यादा हीन पुरुष कहलाने के लिए पर्याप्त है |
फिर राम मर्यादापुरुषोत्तम क्यूँ कहलाते हैं ?
श्री राम ही नहीं, यदि कोइ भी अत्यंत शक्तिशाली व्यक्ति जिसकी प्रिये पत्नी का अपहरण हो गया हो, उसका पहला धार्मिक कर्तव्य है कि पूरी शक्ति लगा दे, अपनी पत्नी को वापस लाने के लिए, और अपहरणकरता को उचित दंड देने के लिए |


एक पुरुष एक विबाह..को राम धर्म क्यूँ नहीं बना पाए  ?
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post_26.html

REASONS FOR FAILURE OF SHRI RAM IN ESTABLISHING “ONE MAN, ONE WIFE” AS DHARM 
श्री राम भगवान विष्णु के अवतार थे जो कि अत्यंत कठिन समय मैं , समाज को उचित दिशा , अपने स्वंम के उद्धारण से दर्शाने आए थे ! समझने कि बात यह है कि अवतार समाज मैं सुधार किस प्रकार लाते हैं ?......क्या हर प्रयास उनका सफल हो जाता है ? अगर ऐसा होता तो त्रेता यग मैं एक के बाद एक अवतार क्यूँ आए ? परशुराम अवतार के तत्पश्यात राम अवतार , क्यूँ ? 


नहीं, यदि ऐसा होता तो परशुराम अवतार के बाद तुरंत  राम अवतार कि आवश्यकता नहीं पड़ती | 


यह ब्लॉग रह रह कर इस बात को बताने का प्रयास कर रहा है कि हिंदू, पृथ्वी के विकास का कारण सृजन(CREATION) नहीं , क्रमागत उन्नति(EVOLUTION) मानते हैं , और यही कारण है कि हिंदू इस बात को मानते हैं कि जब जब समाज कि स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है और ऐसा लगने लगता है कि प्रलय निश्चित है, तब इश्वर मनुष्य रूप मैं अवतार लेते हैं | लकिन मनुष्य रूप मैं , इश्वर अवतार की भी सीमाए है | तो, जो अनेक सुधार अवतार चाहते हैं , उन मैं से कुछ पर अंकुश लगाना होता है क्यूंकि चमत्कार तो अवतार के पास होता नहीं है | समाज के शक्तिशाली लोग सुधार, तथा उससे होने वाले परिवर्तन का विरोध करते हैं, और अवतार, बिना अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति के मात्र उद्धारण से धर्म स्तापित करने का प्रयास करते हैं | स्वाभाविक है ऐसे मैं कुछ समस्याओं का समाधान नहीं हो पाता | 


श्री राम ने भी एकाधिक विवाह का विरोध करा, तथा नियम बनाया कि एक से अधिक पत्नी कोइ नहीं रखेगा , परन्तु उसे कभी भी धर्म की मान्यता नहीं दिला  पाए | व्यक्ति जब धन और शक्ति अर्जित कर लेता है तो उसे हर सुख चाहिए, उसके लिए ऐसे शक्तिशाली व्यक्ति, आवश्यक परिवर्तन धर्म मैं भी करा देते हैं | येही कारण है कि ‘एक पुरुष एक विवाह’ कभी धर्म नहीं बन पाया |


याद रखिये शक्तिशाली व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से सदेव धर्म के साथ होता है , वह धर्म मैं हेरफेर करके धर्म को अपने साथ करने की  क्षमता रखता है, और यही कारण है की पतन पहले धर्म का होता है, फिर समाज का और फिर श्रृष्टि का |


पाखंडी बाबा पर अंकुश लगाईये
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post_25.html

STOP EXPLOITATION OF HINDU SAMAAJ FROM FRAUDULENT BABAS
आज कल एक पाखंडी बाबा की ठगाई के चर्चे हर जगह हो रही हैं !

लोग पाखंडी बाबा की ठगाई की बात तो करते हैं , लकिन केवल अपनी भावना व्यक्त करने के लिए |

जब बाबा ठगाई के लिए टी वी को माध्यम चुन रहे हैं , उसके खिलाफ कुछ भी कैसे साबित कर पायेंगे ?

सनातन धर्म मैं ऐसे लोगो पर अंकुश कैसे लगाना है, साफ़ बताया है , प्रयास क्यूँ नहीं करा जा रहा,  यह आप बताएं?



क्या रामायण मैं वर्णित नागपाश अस्त्र, एक रसायन शस्त्र था ?
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post_23.html

WAS NAGPAASH A CHEMICAL WEAPON?
रामायण त्रेता युग का इतिहास है, और यह हिंदू समाज जितनी जल्दी समझ ले उतना ही देश के लिए और हिंदू समाज के लिए लाभकारी है ! आम हिंदू बड़े गर्व से यह तो कहता है की रामायण के काल मैं विमान थे, लकिन जब उससे इस सत्य के अनुसार इतिहास को समझने को कहा जाता है, तो वोह संस्कार या अपने गुरु का हवाला दे कर अलग हो जाता है ! यह दोनों तरह से गलत है ! संस्कार कभी यह नहीं कहते की नई सूचना का स्वागत मत करो; यह तो रूढिवाद हो गया ! हिंदू धर्म और हमारे संस्कार कभी भी रूढिवाद की अनुमति नहीं देते ! 


उसी तरह से धर्म गुरु यदि समाज की प्रगति के लिए धर्म का प्रचार कर रहै हैं , तो वे भी इस रूढिवाद को अस्वीकार कर देंगे , लकिन अफ़सोस ऐसा हो नहीं रहा है ! आज के धर्म गुरु धन और राजनेतिक शक्ति के लिए धर्म का प्रचार कर रहे हैं , और यही कारण है की आजादी के ६५ वर्ष बाद हिंदू समाज गरीब हो गया और धर्म गुरु शक्तिशाली और धनवान !


ध्यान रहे इस नकारात्मक अभिवृत्ति के कारण, हिंदू संस्कृति जो कि अत्यंत गौरवपूर्ण है, उसका सदुपयोग हम अपनी अंतररास्ट्रीय छबी सुधारने के लिए नहीं कर पा रहे हैं , तथा यह एक प्रमुख कारण है हमारे हीन मानसिकता की ! 


इश्वर परुशुराम अवतार तत्पश्चात् राम के रूप मैं क्यूँ अवतरित हुए 
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post_22.html

WHAT PROBLEMS REQUIRED VISHNU TO COME AS RAM JUST AFTER PARASHURAM?
आजादी के बाद हिंदू समाज कि प्रगति नहीं हो पा रही ! और तो और, समाज की कर्महीनता के कारण अपने ही देश मैं हिंदू समाज की उचित मांगो को अनदेखा कर दिया जा रहा है ! अपने ही देश मैं हिंदू समाज धीरे धीरे असुरक्षा कि और जा रहा है !

आजादी के बाद धर्म का उपयोग , ऐसा लग रहा है की हिंदू समाज के शोषण के लिए हो रहा है ! हिंदू धर्म मैं समाज की भौतिक प्रगति हर समय हो सके इस बात का विशेष व्यस्था है, वह भी धर्म के प्रचलन को लेकर ! लकिन इस पर कोइ चर्चा तक के लिए तत्पर नहीं है ! यह भी कोइ नहीं समझाना चाहता कि समाज कि प्रगति उन्नतिशील रहे इसके लिए धर्म को समझने के लिए दो तरह के संसाधन उपलब्ध हैं ; एक तो शुद्ध वेदिक धर्म, जिसके लिए वेद उपलब्ध हैं, तथा पुराणिक इतिहास इश्वर अवतार का, जिसमे रामायण और महाभारत उपलब्ध हैं !

हर तरफ व्यावसायीकरण नज़र आता है ! प्रमाणित आकडे बता रहे हैं कि हिंदू समाज गरीबी कि और बढ़ रहा है, और धर्म गुरु , जिनपर इस समाज को प्रगति कि और ले जाने का दाइत्व है, वे अत्यंत शक्तिशाली और धनवान हो गए हैं , तथा राजनीतिक शक्ति भी उनके पास है ! फिर क्या कारण है कि हिन्दुस्तान मैं हिंदू समाज कि उचित मांग को अनदेखा कर दिया जाता है ? समय दीजिए और इसे समझिए ! आम हिंदू को ही अब कुछ करना होगा !


शिव धनुष को विघटित करके राम ने क्या धर्म स्थापित करा
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post_20.html

WHAT DHARM SHRI RAM ESTABLISHED WHILE DISMANTLING SHIV DHANUSH 
हिंदू धर्म रामायण को इतिहास मानता है, और उसके पीछे कारण यह है कि यदि वेद को समझने मैं कोइ त्रुटि हो रही हो, तो रामायण और महाभारत को दूसरा वेद मान कर , मनुष्य रूप मैं अवतार ने,  जो आदर्श और उद्धारण प्रस्तुत करें हैं , उसे धर्म मान कर आगे बढ़ा जाय ! सोच यही रही है कि समाज कि प्रगति हर समय होनी चाहिए; और यदि नहीं हो रही है तो धर्म को गुरुजन सही तरह से नहीं समझा पा रहे हैं ! इतना सब होते हुए भी समाज कि उनत्ति नहीं हो पाती, अत्यंत खेद का विषय है !


यहाँ पर ‘शिव धनुष को विघटित करके राम ने क्या धर्म स्थापित करा’ इस पर चर्चा  करेंगे! आपको फिर से बताना चाहूँगा, की हर महत्वपूर्ण इतिहासिक घटना जो रामायण मैं घटी है, उससे हमें धर्म मिलेगा जो की आज भी उतना ही कारगर होगा ! इसका सीधा अर्थ यह भी हुआ की हर घटना जिसमें श्री राम और माता सीता शामिल हैं, वह एक धर्म समाज को बताएगी ! इससे यह भी लाभ मिलता है की रामायण मैं अनकहे जो रिक्त स्थान है उन्हें भरने मैं भी सहायता मिल जाती है !  


सीता अपहरण पश्यात राम ने युद्ध हेतु अयोध्या से सेना क्यूँ नहीं बुलाई ?
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post_19.html

WHY WERE FORCES TO FIGHT RAVAN AND LANKAN FORCES, NOT SUMMONED FROM AYODHYA AFTER SITA’S ABDUCTION BY RAVAN?
यह प्रश्न अत्यंत स्वाभाविक है , यदि हम रामायण को इतिहास और श्री राम और माता सीता को  इश्वर अवतार मानते है ! कंही कंही  यह बात भी कही जाती रही है कि, वनवास मैं राम अयोध्या से सेना कैसे बुला सकते थे ! यह बिलकुल गलत बात है जो कि उन लोगो ने फैला रखी है जो हिंदू समाज का भला नहीं चाहते ! जब राम कि चरण पादुका अयोध्या के सिंघासन पर विराजमान थी , और सीता को तो वनवास दिया नहीं गया था, तो यदि राम ने अयोध्या से सेना नहीं बुलाई , तो ‘क्यूँ नहीं बुलाई’ यह एक अत्यंत गंभीर विषय है !
श्री राम ने १४ वर्ष के वनवास में वानरों को, जो कि मनुष्य कि नई प्रजाति थी, को समाज में रहने के नियम की, तथा सैन्य प्रशिक्षण भी दिया था !
यही कारण है कि वानर सेना आधुनिक अस्त्रों से लिप्त राक्षसी सेना से युद्ध में सफल हो पाई ! यहाँ यह बात अच्छी तरह से समझ लें कि जिस समय लंका के पास विमान तक थे और सेना के पास आधुनिक अस्त्र, तो उसे पत्थर फेकने वाले वानरों की सेना ने तो नहीं हराया !


गोस्वामी तुलसीदास कर्त रामचरितमानस...उस समय कि सामाजिक पृष्ठभूमि में समीक्षा
http://awara32.blogspot.com/2012/04/blog-post.html

RAMCHARITMANAS OF GOSWAMI TULSIDAS ...REVIEWED IN LIGHT OF SOCIAL BACKGROUND OF THAT PERIOD
गोस्वामी तुलसीदास  सोल्वी शताब्दी(१५३२-१६२३) के महाकवि थे, जिन्होंने हिंदी कि अवधि भाषा में रामचरितमानस कि रचना करी ! उनका योगदान हिंदू धर्म कि रक्षा के लीये सरहानीय है ! कुछ लोगो का मत है की वोह हनुमान जी के अवतार थे, तो कुछ कहते हैं की हनुमान जी की उनपर असीम कृपा थी; तो कुछ उन्हें महारिषि वाल्मीकि का अवतार मानते हैं ! जो भी हो, सचाई यह है की हिंदू समाज उस समय घोर संकट मैं था, और गोस्वामी तुलसीदास  ने तथा अन्य संतो ने अनेक बदलाव धर्म मैं करके, किसी तरह से हिंदू समाज को बचा लिया !


उस समय हिंदू समाज अनेक जटिल समस्याओं से जूंझ रहा था ! एक तरफ मुस्लिम शासको का अत्याचार, दूसरी और अपने चारों तरफ मुस्लिम समुदाय कि बढती होई आबादी, जिनको शासन का संगरक्षण प्राप्त था और जो शासन के साथ मिल कर हिंदू समुदाय पर अत्याचार कर रहे थे ! और भरसक प्रयास कर रहे थे कि हिंदू समाज मैं अधिक से अधिक धर्म परिवर्तन हो जाय ! जगह, जगह से समाचार आते रहते थे कि अब यह पूरा गाव धर्म परिवर्तन करके मुसलमान हो गया है ! अत्यंत कमजोर स्तिथि थी हिंदू समाज कि ! जवान अविवाहित कन्याओं को अगवा करलिया जाता था, और यदि अगवा करने वाला उससे निकाह करले तो उसे जुल्म नहीं माना जाता था, इसलिए कन्याओं कि शादी कम उम्र में होने लगी ! ऐसे में हिंदू समाज को धर्म परिवर्तन से बचाना एक अत्यंत जटिल और महत्त्वपूर्ण कार्य था !


पृथ्वी का विकास.. सृजन या क्रमागत उन्नति
http://awara32.blogspot.in/2012/03/blog-post_12.html

WHAT IS RESPONSIBLE FOR GROWTH, DEVELOPMENT OF EARTH…CREATION OR EVOLUTION
विश्व में केवल प्राचीन भारत के वृत्तांतों से आपको यह अवगत हो पायेगा कि प्राचीन हिंदू समाज एक अद्भुत सोच विश्व को दे कर गया है जो की क्रमागत उन्नति(EVOLUTION) को पृथ्वी के विकास का कारण मानती है ! हिंदू एक अकेला समाज  है जो कि यह मानता है कि सृजन व् क्रमागत उन्नति में विरोध निराधार है;  क्रमागत उन्नति ब पृथ्वी के विकास और उनत्ति की बात जब आती है तो हमारा विज्ञानिक वर्ग से कोइ विरोध नहीं है ! भारतवासियों को सृजन या क्रमागत उन्नति , किसी से भी कोइ विवाद नहीं है ! जैसा कि ऊपर उल्लेख है, इस विषय पर प्राचीन ग्रंथो में अनेक वृतांत भी हैं !

हिंदू समाज, धर्म तथा ज्ञान, क्रमागत उन्नति को विशेष महत्त्व देता है ! हम मानते हैं कि क्रमागत उन्नति ही श्रृष्टि के सृजन का कारण है ! इस पर स्पष्ट रूप से अनेक संकेत आपको हिंदुओं के प्राचीन इतिहास में मिलेंगे ! हिंदुओं की मान्यता है कि ईश्वर  ने ब्रह्मांड का निर्माण करा परन्तु उसके आगे सृजनका कार्य क्रमागत उन्नति  द्वारा ही हुआ है ! अत: क्रमागत उन्नति  ही पृथ्वी के विकास का कारण है, न की सृजन  !

यह भी ध्यान देने की बात है कि हिंदू ईश्वर के अवतार में विश्वास रखते हैं; हिंदू यह नहीं मानता कि स्वर्ग में बैठे ईश्वर समाज या मनुष्य की कोइ मदद कर सकता है ! यदि समाज घोर पतन की और जा रहा है, तो ईश्वर  मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं, समाज की दिशा में आवश्यक सुधार मनुष्य के रूप में ही लाते हैं, और मनुष्य को प्रेरित करते हैं, समाज को प्रगति के मार्ग पर बढाने के लीये ! यही अवतार का उद्देश है !


हमारी मान्सिकता रामायण को इतिहास नहीं मानने देती
http://awara32.blogspot.in/2012/03/blog-post.html

PASSIVENESS DOES NOT ALLOW US TO ACCEPT RAMAYAN AS HISTORY 
|| ध्यान रहे कि रामायण यदि इतिहास है तो उसमें किसी भी चरित्र के पास अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति नहीं हो सकती ||
क्या कारण है कि हमसब के परस्पर प्रयास के फल स्वरुप लोगो ने यह तो स्वीकार कर लिया कि वानर बन्दर नहीं, वन में नई मनुष्य प्रजाति कि उत्पत्ति थी ..........
संभव है कि संस्कार और सूचना के आधार पर इसे स्वीकार करना सरल था !
लेकिन जब जब हम सब ने आपसब से अनुरोध करा है कि रामायण को त्रेता युग का इतिहास मान कर समझे , स्पष्ट विरोध या यूँ कहीये ऐसा अवश्य अनुभव हुआ है कि आपने दूरी और बढा ली .....क्या कारण हो सकता है ?


और वह जब, जब आपके संस्कार यह चाहते हैं कि आप रामायण को मिथ्या न मान कर इतिहास ही माने , इसमें कहीं कोइ विरोधाभास नहीं है ! फिर क्यूँ ? 
अपने इतिहास, अपने इश्वर/प्रभु की मनुष्य रूप में जो लीला होई हैं उसको अधिक सम्मान मिल सके यह आपके मन की बात है, फिर संकोच क्यूँ ? 
सोचिये और कमसे कम अपने को तो इमानदारी से उत्तर दीजिए !


उत्तर स्पष्ट है, आप रामायण को इतिहास मानने को पूरी तरह से इच्छुक हैं लेकिन उसके लीये इस बात को कदापि नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं कि इतिहास अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं को नहीं मानता ! रामायण के अधिकाँश चरित्रों को अब तक जो दर्शन/विवरण आपको समझ में आया है वह अलोकिक शक्ति के साथ ही है ! इस अंतरविरोध का आप स्वंम को सही उत्तर देना का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं ! रामायण को आप इतिहास तो मानना चाहते है लेकिन आप स्वंम  अपने इस विश्वास को कैसे ठेस पहुचायं, कि हमारे भगवान के अवतार अलोकिक शक्ति रखते थे ? 
आपकी मान्सिकता इसको नहीं मानना चाहती कि रामायण के चरित्र अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति नहीं रखते थे ! आपका मन इसे किसी तरह से स्वीकार नहीं करना चाहता !


परशुराम का अवतार वानर प्रजाति और स्त्रियों की रक्षा के लीये
http://awara32.blogspot.in/2012/02/blog-post_28.html

PARASHURAM AVATAR WAS TO REDUCE ATROCITIES ON VAANARS AND FEMALES
यह प्रश्न बार बार उठता है कि श्री विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार क्यूँ लिया, तथा उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन क्यूँ करा ?
इससे पहले की इसपर विस्तार से चर्चा हो, यह जानना आवश्यक है कि त्रेता युग में, उस समय की भूगोलिक व् सामाजिक स्थिती क्या थी ?
नई श्रिष्टी का आरम्भ सतयुग से होता है, तथा आरम्भ में सब कुछ अत्यंत धीमी गति से होता है ! आरम्भ में पृथ्वी का अधिकाँश भाग जलमग्न था, सीमित स्थान था मनुष्य को रहने के लीये ! कुर्म अवतार के साथ जब समुन्द्र में लहरों का गठन आरम्भ हो गया तो पृथ्वी का कुछ और भाग मनुष्य के रहने के लीये उपलभ्ध हुआ ! वराह अवतार उपरान्त पृथ्वी का प्रचुर भाग मनुष्य के रहने के लीये उपलभ्ध हुआ !
यह भी समझना आवश्यक है कि पिछले महायुग/कल्प से मनु इस नए महायुग में प्रवेश करते हैं , तथा अपने साथ पुराने युग के कुछ मानव को भी साथ लाते हैं, जिनमे से जो मनुष्य का मांस खाने लगे थे वे राक्षस कहलाते थे, और जो समुन्द्र में मनु के साथ निश्चित जाति वर्ग को मानते थे वे आर्य ! इन आर्यपुत्रो ने पृत्वी पर जगह जगह अपने रहने के लीये बस्ती बना ली, फिर वह धीरे धीरे राज्य कहलाने लगे ! राक्षस अलग रहने लगे तथा उनका अन्य मनुष्योंके साथ दुर्व्यवाहर और भी सक्रीय हो गया !


रामायण में व्याख्या और अंतर्वेषण(INTERPRETATION and INTERPOLATION) http://awara32.blogspot.in/2012/02/interpretation-and-interpolation.html

रामायण एक महाग्रन्थ है, तथा त्रेता युग का इतिहास ! चुकि इतिहास का संबंध उस युग के महान नायकों से होता है, इसलिए रामायण के किसी भी चरित्र के पास चमत्कारिक व् अलोकिक शक्ति नहीं थी ! यह समझे बिना न तो हम रामायण को समझ सकते हैं , न ही श्री विष्णु अवतार राम ने जो आदर्श स्थापित करे हैं उनका लाभ ले सकते हैं !
रामायण एक अत्यंत ही प्राचीन इतिहास है, कम से कम पांच लाख वर्ष से भी पहले का ; और चुकि इतिहास की मान्यता सदैव तथ्य और प्रस्तुति पर आधारित है उसमें अनेक प्रसंग जोड़े और हटाए गये होंगे, और अनेक स्पष्टीकरण भी आये हैं ! ध्यान रहे प्रस्तुति सदैव वर्तमान समाज या शासकीय प्राथमिकताओं पर आधारित होती है ; तथा यही इतिहास की परिभाषा भी है !
चुकी त्रेता युग में विज्ञान का अत्यधिक विकास था, जिसमें विमान तथा प्रलय स्वरूपि अस्त्र-शास्त्र(उद्धरण: शिव धनुष) भी थे , इन पांच लाख वर्षों में ऐसे अनेक समय आये थे जब विकसित विज्ञान, विमान एक कल्पना मात्र था, उस समय उस इतिहास को समझाने के लीये मिथ्या की चादर इतिहास पर लपेटने पड़ती थी , तथा उसके लीये इन चरित्रों को अलोकिक व् चमत्कारिक शक्तियों से सुसज्जित कर दिया जाता था ! यही नहीं, केवल १०० वर्ष पूर्व तक भारत में भी इसके अतिरिक्त कोइ विकल्प नहीं था ! प्रसंग को उस समय के समाज और शासकीय प्राथमिकताओं के अनुकूल बनाने के लीये अलोकिक शक्तियां तथा व्याख्या और अंतर्वेषण का उदार प्रयोग आपको रामायण में दिखाई देगा , जिसको हटाना समय की गंभीर आवश्यकता है !


गीता और वंदे मातरम
http://awara32.blogspot.in/2012/02/blog-post.html 

GITA , VANDE MAATRAM
गीता समस्त धर्म की जड़ है, वह सब धर्म का सोत्र है, यदी धर्म की भी उत्पत्ति होई है, तो गीता समस्त धर्म की माँ है !

धर्म, समाज और समाज में रह रहे प्रत्येक व्यक्ति के लीये नियम और मार्गदर्शन करता है , इसलिए गीता धर्म ही है, परन्तु समस्त धार्मिक पुस्तकों, या उपदेशो से अलग ! गीता सिर्फ प्रेरणा है ; प्रेरणा की एक ऐसी नदी, जिसके  पास आप पहुँच जाएं, तो जीवन प्रेरणा से भर जाएगा !

क्या कारण है, हम इतने कर्महीन क्यूँ हैं, तथा हमारे मन में यह विचार भी नहीं आ पा रहा है कि यदि दो शब्द 'वंदे मातरम्' से इतनी प्रेरणा मिल सकी कि हम आजादी कि लड़ाई जीत सके ; तो या तो हमारी नियत में खोट है, या हमें जान बूझ कर गीता से ज्यादा गीता के अनुवाद करने वाले लोगो को महत्त्व दिलाने की चेष्ठा करी जा रही है !

प्रश्न सिर्फ इतना है कि क्या युद्ध के आरम्भ में भगवान कृष्ण ने धर्म या ज्ञान का उपदेश दिया था, या, प्रेरणा रूपी सोत्र से अर्जुन को अपने कर्म पर चलने के लीये प्ररित करा ?

वैसे किसी से भी यदि यह प्रश्न पुछा जाएगा तो वह प्रश्न पूछने वाले को मुर्ख बताएगा या यह समझ लेगा की उसका उद्देश नेक नहीं है ! क्यूँकी युद्ध के आरम्भ में प्रेरणा भरे सोत्र कहे जाते हैं, न की धर्म का उपदेश ! धर्म का उपदेश युद्ध में उस व्यक्ति को दिया जाता है जो गंभीर रूप से घायल हो, मृत्युशय्या पर पहुँच गया हो !


क्या स्वर्ग में बैठे देवता मनुष्यों के तप से घबरा जाते हैं
http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_30.html

DO DEVTAS SITTING IN SWARG GET THREATENED BY TAPS OF WE EARTHLINGS?’ 
ऐसे अनेक प्रसंग हैं कि देवता, मनुष्य के तप से घबरा जाते हैं, और इसी बात से यह कहावत भी आम है कि इन्द्र का सिंघासन डोल गया ! क्या इसमें कुछ सचाई है ? क्या वास्तव में तप को खंडित करने के लीये अप्सरा भेजी जाती  हैं ?
इससे  दो सन्देश मिलते हैं !
इस प्रश्न के उत्तर से पूर्व तप की परिभाषा क्या होनी चाहीये, इसपर जरा सोच लें ! हिंदू शास्त्रों में सामूहिक कठोर प्रयास को यज्ञ कहा जाता है ओर व्यक्तिगत कठोर प्रयास को तप ! तप का अर्थ हर समय आँख बंद करके इश्वर में लीन होना नहीं है; तप का अर्थ है व्यक्तिगत कठोर प्रयास ! 
यदि व्यक्ति पूरी निष्ठां और सकारात्मक भाव से किसी भी धार्मिक कार्य में यथाशक्ति प्रयत्नशील है , तो वह नियति में भी परिवर्तन कर देता है, तथा हर धर्म किसी न किसी रूप में इसको स्वीकार करता है ! हर मनुष्य की स्वंम की ऊर्जा होती है, जो की पृथ्वी की उर्जा से सकारात्मक या नकरात्मक स्थर पर संबंध स्थापित करती है ! पृथ्वी की उर्जा का संबंध सदा सौर मंडल की उर्जा से रहता है , और सौर मंडल का ब्रह्मांड से ! धार्मिक कार्य चुकि समाज के लीये लाभकारी होता है, समस्त विश्व की उर्जा उसका सत्कार करती है तथा उस तप को प्रतिष्टित करने में सकारात्मक भाव रखती है ! इसी लीये महान पुरुष के कार्य के साथ अनेक दन्त कथा जुड जाती हैं, तथा उस तप को अलोकिक रूप दे देती हैं !


वन जाने में कैकई ने राम की सहायता क्यूँ करी
http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_26.html

DID KAEKAI ARRANGED VANVAAS FOR RAM ON HIS REQUEST?
अब जब कि सब राजकुमार विवाहित हो गये तो महाराज दसरथ अपने अंतिम उत्तरदायित्व से भी मुक्त होना चाहते थे, और वह था युवराज की विधिवद घोषणा और तिलक ! परिवार में इसको लेकर कोइ विरोध भी नहीं था, कि ज्येष्ट पुत्र श्री राम ही इसके उत्तराधिकारी हैं ! समस्या थी तो केवल इतनी कि श्री राम विवाह से पूर्ण रावण को वचन दे आय थे कि वे वानर के पुनर्वास हेतु १४ वर्ष वन में रहेंगे ! राम इस कार्य पर तत्काल प्रगति करना चाहते थे और उसके लीये वे निवेदन भी कर चुके थे कि भरत को युवराज मोनोनीत कर दिया जाय ! इसके लीये न तो भरत न ही राजपरिवार के अन्य सदस्य सहमत थे ! सबका यह कहना था कि राम इस कार्य को जब राम कि संतान बड़ी हो जाय, तब भी कर सकते हैं ! संषेप में कोइ भी राम का इसमें साथ नहीं दे रहा था ! विस्तार के लीये पढ़ें: रामायण ..त्रेत्र युग का इतिहास

उस युग के अपने अलग आदर्श थे ! संभवत: इसीलिये दसरथ ने राम के मन की स्थति जानते हूए यह प्रसंग तब गंभीरता से उठाया जब भरत भी नहीं थे ! एक अत्यंत शुभ मुहूर्त आ रहा था, तथा दसरथ ने अपना यह निर्णय सुना दिया कि वह राम का युवराज पद पर राजतिलक आने वाली शुभ मुहूर्त में ही करेंगे ! घोषणा हो चुकी थी; राम के पास निकलने का कोइ विकल्प नहीं था ! वह यह भी जानते थे कि यह सब इतनी जल्दी में क्यूँ हो रहा है ! एक आदर्श पुत्र के नाते वे पिता के आदेश की अवहेलना भी नहीं कर सकते थे !


राम राज्य ..सामाजिक न्याय और धर्म का राज्य
http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_22.html

RAM RAJYA..AN EQUAL OPPORTUNITY RULE OF LAW
इससे पहले कि आगे बढ़ें सनातन धर्म का अर्थ समझ लेते हैं ! सनातन धर्म का गैर किताबी अर्थ है , सम्पूर्ण हिंदू समाज का विकास जिसमें सबके पास बराबर के विकास के अवसर हों !            
राम राज्य उस विकासशील राज्य को कहते हैं जो राम ने अयोध्या का राज्य ग्रहण करने के पश्यात करा ! उस राज्य में निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया थी जिसके सामने राजा और आम व्यक्ति एक सामान थे ! अन्याय किसी के साथ संभव नहीं था ! ऐसी मान्यता है कि यदि कोइ राजा ऐसी निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के साथ राज्य कर सके तो प्रकृति व् इश्वर उस राज्य को सुख और समृद्धि से पारीपूर्ण रखता है, तथा जीवित माता पिता के सामने संतान कि भी मृत्यु नहीं होती ! राम राज्य ऐसा ही राज्य था , जिसमें धर्म और राजकीय व् सामाजिक न्याय में सामंजस्य था ! ऐसा राज्य केवल चक्रवर्ती सम्राट राम के समय में ही संभव हो पाया है ! 


ध्यान रहे कहने में और करने में अंतर होता है ! निष्पक्ष न्याय करना अत्यंत ही जटिल कार्य है ! अनेक ऐसे विषय होते हैं जिसमें समझोता करना पड़ता है !, स्वंम राम ने युद्ध की स्थिति में समझोते (बाली वध) करें थे, लेकिन तब वोह राजा नहीं थे ! यह एक सन्देश है राम राज्य  का कि निष्पक्ष न्याय अत्यंत जटिल है !


त्रेता युग की मर्यादाएँ और मर्यादा पुरुषोत्तम राम
http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_20.html

MARYADA OF TRETA YUG AND MARYADA PURUSHOTTAM RAM
“यह बात विशेष ध्यान देने की है कि धर्म को झुकना पड़ता है, जब वोह प्रतिष्टित और शातिशाली लोगो से टकराता है ! और इसीलिये भगवान को बार बार अवतार लेना पड़ता है ! स्वंम श्री राम एकाधिक विवाह को धर्म मानते हुए और उद्धारण स्थापित करने के बाद भी, ऐसा कोइ प्रबंध नहीं कर पाए कि भविष्य में इसपर सख्ती से अमल हो सके”
श्री राम, त्रेता युग के आदर्श माने जाते हैं, तथा भगवान श्री विष्णु के अवतार भी है ! उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से भी जाना जाता है ! यहाँ इस विषय पर चर्चा करेंगे कि मर्यादा और धर्म में क्या अंतर है, तथा इस गलत धारणा पर भी विचार करेंगे कि श्री राम, मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहलाते हैं क्यूंकि वोह ईशवर अवतार हैं !
सबसे पहले तो यह बात सबको समझनी है कि मर्यादा इतिहास का एक अंग है, अर्थात मर्यादा समय के साथ साथ बदल सकती है ! तथा उसका ईशवर से कोइ भी संबंध नहीं है ; मर्यादा एक निश्चित समय के महान मनुष्यों का आकलन करती है, उस समय कि महान परम्पराओं के सन्दर्भ में ! यदि उस समय के महान पुरुष/मनुष्य उन महान परम्पराओं/मर्यादाओं का पालन अपने जीवन में कर पाते हैं तो वोह मर्यादा पुरुष कहलाते हैं ; मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं ! ध्यान रहे मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं !


अवतार व भगवान और हिंदू समाज की प्रगति
http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_5848.html

AVATARS BY EXAMPLE ESTABLISH DHARM 
ईशवर की मनुष्य रूप में या अन्य प्राणी के रूप में उत्पत्ति को अवतार कहा जाता है ! उद्देश श्रृष्टि को उस समय के घोर संकट से निकालने का होता है ! लेकिन अवतार को लेकर विवाद भी हैं, कुछ हिंदू अवतार को मानते हैं, कुछ नहीं ! 
अवतार को लेकर विवाद इस लीये  भी है क्यूंकि कोइ निश्चित परिभाषा अवतार कि नहीं है !
चुकी परिभाषा हर युग के समाज के लीये प्रगतिशील होनी है, इसलिए अवतार के पास अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति होने कि कोइ संभावना नहीं है ! इस संधर्ब में, त्रेता युग के विज्ञान का उल्लेख करना चाहता हूं, जब विमान तक थे, लेकिन आज के सूचना युग में हमें उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, क्यूँकी अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति की मिथ्या चादर बना कर उस विज्ञान को ढक दिया गया है ! और आज के गुरुजन ज्ञान और समाज हित व्यवाहर के अभाव में मिथ्या कि चादर उतारने के लीये तैयार नहीं हैं ! इसके कारण हिंदू समाज का नुक्सान ही नुक्सान होरहा है ! ध्यान रहे ऐसे अनेक समय हर युग में आये हैं जब अलोकिक और चमत्कारिक शक्ति की मिथ्या चादर के सहारे ही विज्ञान को उस समय के समाज को समझाया जा सकता था; और तो और १०० वर्ष पूर्व तक भारत में भी इस मिथ्या चादर ही एक मात्र साधन था त्रेता युग के विज्ञान को समझाने का, लेकिन आज तो यह अधर्म है और सामाजिक अपराध भी ! 
यह सत्य है कि ईशवर सर्व शक्तिमान है, फिर क्या कारण है कि वोह अपनी शक्तियों पर अंकुश लगाता है, अवतार बन कर ? कोइ तो ऐसा कारण होना चाहीये जिसका उत्तर विवाद रहित हो !
धर्म शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया गया है कि अवतार जो उद्धारण प्रस्तुत करते हैं उसे दूसरा वेद मानना चाहीये ! क्या अर्थ हूआ इसका ?


देवो के देव- महादेव... हिंदी में समीक्षा
http://awara32.blogspot.com/2012/01/devon-ke-dev-mahadev-review-in-hindi.html

DEVON KE DEV – MAHADEV... A REVIEW IN HINDI
एक अत्यंत ही रोचक धारावाहिक आ रहा है स्टार टीवी कि नई चैनल ‘लाइफ ओके’ पर, जिसका नाम है, “देवो के देव...महादेव” !

हिंदू धर्म, तथा देवी देवता पर धारावाहिक बनते ही रहते हैं !

समझना आपको यह है कि आप इन सब धारावाहिक को किस दृष्टि से देखते हैं ! चुकी जिसने भी यह धारावाहिक/सीरियल बनाया है वोह आपकी धार्मिक भावनाओं को मान्यता देकर आपसे यह अपेक्षा रखता है कि आप इसे देखें, तथा धर्म को समझे, और उसका अनुसरण करें !

यह सीरियल तथा अधिकतम हिंदू प्राचीन इतिहास से सम्बंधित सीरियल आपको बार बार यह जानकारी अवश्य देते हैं कि श्रृष्टि की रचना दोष रहित नहीं है ! दोष वहाँ भी हैं ! उद्धारण, ईशवर शिव ने ब्रह्मा जी का पांचवा सर काट दिया ! कथा बताती है कि ब्रह्मा ने प्रथम रचना ‘सतरूपा’ कि करी और उसके रूप से वे इतने मोहित हो गए कि वो उससे दृष्टि हटा नहीं पा रहे थे ! सतरूपा, ब्रह्मा कि दृष्टि से बचने के लीये जिधर जाती, ब्रह्मा उधर एक मुख् उत्पन्न कर लेते ! इस तरह से चारो दिशा में उनके चारों मुख् हो गये! सतरूपा अब ऊपर की और चली, तो ब्रह्मा ने एक मुख् ऊपर भी कर लिया ! भगवान शिव से यह देखा नहीं गया, उन्होंने ब्रह्मा का ऊपर का सर अलग कर दिया ! शिव के विचार से सतरूपा ब्रह्मा द्वारा रचित थी इसलिए वे ब्रह्मा कि संतान होई ! इसी सोच से उन्होंने ब्रह्मा को श्राप दे डाला कि पृथ्वीवासी ब्रह्मा कि उपेक्षा पूजा में करेंगे !


महाशिवरात्रि
http://awara32.blogspot.com/2012/01/blog-post_11.html

REASONS FOR CELEBRATING MAHASHIVRATRI 
महाशिवरात्रि उस पावन पर्व का नाम है जब भगवान शिव शंकर ने माता पार्वती से पाणिग्रहण संस्कार कर था ! हिंदू मान्यता बताती है कि त्रिमूर्ति में ब्रह्मा श्रृष्टि की रचना करते हैं, विष्णु उसका पालन, तथा शिव उसका संघार ! मानव स्वभाव कि चर्चा न करते हूए यह बताना ही पर्याप्त होगा कि भगवान शिव के विवाह को श्रृष्टि की प्रगति और विकास के लीये लाभकारी मानते हूए श्रधालु बड़ी धूमधाम, और जोश से इस पर्व को मनाते हैं !


यदि आप आकड़ो पर जाते हैं तो आप पायेंगे की भारत में सबसे ज्यादा मंदिर शिव के हैं, फिर विष्णु तथा उनके अवतार जैसे राम और कृष्ण के, और संभवत: ब्रह्मा का एक सिद्ध और मान्यता प्राप्त मंदिर है, जो कि पुष्कर में है ! मनुष्य पूजा डर से या कुछ लाभ के लीये या फिर वोह श्रृष्टि रचेता को आदर और प्यार देने हेतु करता है , इसपर निर्णय पाठक ही करें !

इस पर्व का महत्त्व इसलिए भी है कि इसमें पूजा करना अत्यंत लाभकारी माना गया है ! अविवाहित कन्या मंगलमय विवाह के लीये, विवाहित दंपत्ति संगतता समस्याओं के समाधान के लीये, तथा अन्य ईश्वर की अनुकंपा के लीये पूजा करते हैं !


अब मुख्य विषय पर आते हैं ; शिवरात्रि, या महाशिवरात्रि कब मनाई जाती है, अर्थात क्या खगोलिक बिंदु हैं इस पर्व कि तिथि सुनिश्चित करने के लीये !


राम सुग्रीव मैत्री संधि ...एक विश्लेशण
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REASON FOR KILLING BALI IN SUCH DEPLORABLE MANNER
सीता अपहरण के पश्चात , तथा यह जानकारी मिलने के बाद कि सीता का अपहरण रावण ने करा है, राम को अब यह निर्णय लेना था कि रावण से युद्ध कैसे करा जाय ! वोह अयोध्या से सेना बुलवा सकते थे ! ध्यान रहे वनवास कि ऐसी कोइ शर्त नहीं थी कि अयोध्या के राजघराने कि बहु, या महारानी सीता के प्रति अयोध्या का कोइ उत्तरदायित्व नहीं था, न यह बात तर्कसंगत है ! इसलिए भी यह गंभीर विषय है कि राम ने अयोध्या कि सेना न बुला कर (जिसमें जनकपुरी तथा अन्य मित्र राज्यों कि सेना भी निश्चित रूप से सम्मलित होती) देखने  में कम शक्तिशाली सेना क्यूँ चुनी, जो कि तर्कसंगत और नीतिसंगत नहीं था !

श्री राम ने अपने वनवास का अधिक समय वानरों को प्रशिक्षित करने में बिताया था, जिसमें उन्हे ऋषि मुनि, तथा अन्य सहायता भी उपलभ्ध थी ! समस्या सिर्फ इतनी थी कि रावण से युद्ध के लिये विशाल वानर सेना को संघटित करना ! चुकि वानरों का प्रशिक्षण राम के निरक्षण में ही हुआ था, राम, राक्षसों से युद्ध के लिये वानर सेना ही चाहते थे ! दूसरा कारण यह भी था कि यदि वानर सेना से वोह रावण को परास्त कर देते हैं तो वानर जाती का समाज में उपनिवेश सुगमता से हो जायगा !

दूसरे कारण का श्री राम के निर्णय पर कितना प्रभाव था, यह तो आपको स्वयम  तय करना होगा !


रामायण ..त्रेत्र युग का इतिहास
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RAMAYAN IS HISTORY OF TRETA YUG
श्री राम और माता सीता के अनेक चरित्रों का वर्णन रामायण है ! जब सूचना का आभाव था तो लोग इसे कथा मानते थे, तथा इसके इतिहास होने पर प्रश्न चिन्ह था, लेकिन आज नहीं ! आज अधिकांश हिंदू रामायण को त्रेता युग का इतिहास और श्री राम और माता सीता को श्री विष्णु और देवी लक्ष्मी का अवतार मानते हैं ! यह पोस्ट इसी विचारधारा को आगे बढाते हूऐ हिंदू समाज के कुछ प्रश्नों पर विचार व्यक्त करेगी !


सबसे पहले तो हमसब को यह समझना होगा कि इतिहास कभी भी अपने आप में पूरक विषय नहीं माना गया है; उसकी प्रस्तुती इतिहास का प्रमुख भाग है, जो कि सदैव वर्तमान समाज, जिसको उस इतिहास में रूचि है, के अनुकूल होता है ! यही कारण है कि हमारा प्राचीन इतिहास जिसे हम पुराण के नाम से जानते हैं , अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं से भरा पड़ा है ! विभिन् युगों में कुछ समय के लिये विज्ञान के विकास ने ऐसे उपकरण प्रस्तुत कर दिये, जिन्हे अधिकाँश समय, जब विज्ञान विकसित नहीं था, बिना  अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियुओं कि चादर डाले, नहीं समझाया जा सकता था ! साथ में यह भी अत्यंत आवश्यक है कि विज्ञान के विकास के बाद वोह चादर हट जानी चाहिये ! खेद, परन्तु आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ !


हिंदू इतिहास ...सत्ययुग में इश्वर अवतार
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AVATARS OF SATTYUG AS PER HINDU HISTORY
जब जब पृथ्वी पर श्रृष्टि कि प्रगति संकट में होती है तो भगवान पृथ्वी पर अवतरित होते है; और जब जब धर्म कि हानि होती है तो भगवन मनुष्य रूप में अवतरित होते हैं !

सत्ययुग में विभिन्न अवतार क्यूँ प्रकट होए इस पर चर्चा होगी !

इससे पहले आप को यह जानना आवश्यक है कि सत्ययुग के प्रारम्भ में स्तिथि क्या थी ! पिछले कलयुग और नये महायुग/कल्प के बीच में लाखो वर्ष का संधि काल होता है, तथा उसमें पृथ्वी पुन: उत्साहित और उर्जावान होती है ! सत्ययुग नई श्रृष्टि का  प्रारम्भ है, इसलिये अत्यंत धीमी गति से श्रृष्टि का विकास होता है ! परन्तु पिछले युग के कुछ मनुष्य इस श्रृष्टि का अंग भी बनते हैं, वो आर्य तथा राक्षस कहलाते हैं !


राम से पूर्व... धर्म का उपयोग स्त्री जाती के शोषण के लिये
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EXCESSIVE EXPLOITATION OF FEMALES BY RELIGIOUS PERSONS IN SATYA YUG, TRETA YUG 
महाऋषि गौतम कि पुत्री अंजनी, बिना विवाह के गर्भवती हो गयी, तब उन्हे वन में भेज दिया गया, जहाँ हनुमान का जन्म होआ !


माता अहलिया को उन्ही के पति गौतम ऋषि ने उनके कथित अभद्र व्यवहार, के कारण मार डाला !


परशुराम के पिता ने अपने पुत्रों से अपनी माता को मारने को कहा !


परशुराम कि सेना अपने शत्रुओं को मारने के लिये युद्ध में बार बार उतरी, ना कि युद्ध जीतने के लिये! परन्तु वो उन योद्धाओं को जीवित छोड रहे थे जो कि वचन दे रहे थे कि जो महिलाऐं उनके साथ रहती हैं, उनसे वो विवाह करेंगें ! 


यहाँ पर हम उन महान ऋषि जनों कि बात कर रहे हैं जो इतिहास का अंग हैं ! पुराण, इतिहास में इनका विवरण दिया है ! यहाँ पर इस विषय पर चर्चा इस लिये आवश्यक हो गयी, चुकि कुछ लोगो ने इस बात का विरोध करा कि श्री राम से पूर्व धर्म का दुरूपयोग महिलाओं पर अत्याचार करने के लिये हो रहा था !प्रसंग यह था कि श्री राम के समय अग्नि परीक्षा को धार्मिक मान्यता प्रदान थी, और धर्म के माध्यम से स्त्री जाती पर अनेक अत्याचार हो रहे थे! यह एक प्रमुख कारण था श्री राम का अवतरित होने का!


कलयुग का अंत..एक नए कल्प का प्रारम्भ और मत्स्य अवतार
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MATSYA AVATAR and HISTORY OF THE WORLD FROM THE END OF THIS CIVILIZATION TO NEXT
कलयुग के अंत में इस महायुग/कल्प के अंत का समय भी आयेगा. अंत के प्रारम्भ होते ही पहले तो मनुष्य द्वारा जो विपदा उत्पन्न करी गयी हैं, उससे विनाश होगा फिर प्रकृति उस विनाश में सहायक होगी, और अंत में पृथ्वी जलमग्न होने लगेगी ! उस समय जितने भी शक्तिशाली लोग हैं पूरे विश्व में, अर्थार्थ जो सत्ता और सत्ता के निकट हैं, उनको यह अवसर मिलेगा कि वे समुन्द्री जहाजों में बैठ कर जल से होने वाली विपदा समाप्त होने का इंतज़ार करें! ऐसे अनेक जहाज पूरे विश्व से निकलेगें ; लेकिन उन्हे यह नहीं मालूम होगा कि यह एक लंबा सफर है, और उनके आने वाली सैंकडो, हज़ारो पीढीयाँ अब जीवित रहने का संघर्ष करती रहेंगी!


इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथो में भी है, जहां मनु को यह आभास हो जाता है कि पृथ्वी जलमग्न होने वाली है ! यह पोस्ट इसलिये भी आवश्यक है कि आप समझ सकें कि मनु शब्द का प्रयोग क्यूँ करा गया है ! मनु, मानव, मेंन, मादा, मनिटो, आदि अनेक शब्द विभिन् भाषा में प्रयोग करे जाते है, मनुष्य के लिये ! चुकी विश्व भर से समुन्द्री जहाज़ निकले थे तो हर युग के वासियों को समझाने के लिये इससे उत्तम और कुछ नहीं था, कि जहाज़ के बेडे का नायक मनु था !


क्या रावण को मारने के लिये भगवान अवतरित होए
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DID GOD CAME AS AVATAR TO KILL RAVAN
भगवन विष्णु पृथ्वी पर जब जब धर्म की विशिष्ट हानि होती है, तब अवतरित होते हैं ! धर्म की हानि अनेक कारणों से हो सकती है, जिसमे प्रमुख कारण, जो कि हर युग के लिये मान्य हैं, वो इस प्रकार हैं :
1. स्त्री पर विशेष अत्याचार जिसमें धार्मिक गुरुजन भी शामिल हों !
2. कमजोर वर्ग पर विशेष अत्याचार जिसमें धार्मिक गुरुजन भी शामिल हों या चुप्पी सान्ध कर बैठे हों !
3. जब शासकों व् धार्मिक गुरुजनों का व्यवहार श्रृष्टि विरोधी हो जाय !
उपरोक्त तीनो कारण आवश्यक हैं भगवान विष्णु को मनुष्य रूप में अवतार लेने के लिये !

यहाँ पर प्रसंग रामायण का है ! आज़ादी से पहले चुकि हिंदू समाज अत्याचारों से त्रस्त था तथा धर्म परिवर्तन करने ले लिये भी उसे अत्याचार सहने पड़ रहे थे, उस समय संतो ने ही कर्म भाग घटा कर भावनात्मक भाग बढा दिया था ! ताकी कर्महीन होकर ही सही, हिंदू समाज सर झुका कर बुरा वक्त निकाल ले जाय ! उस समय रामायण भावनात्मक तरीके से अत्याचार के विरुध  भावनात्मक संतोष प्रदान करती थी, कि रावण जैसा विशिष्ट राक्षस का भी अंत में संघार हो जाता है ; इसलिये धैर्य रखो, यह जो बाहर से आए हुए राक्षस हैं(अर्थार्थ विदेशी हमलावर जो कि भारत पर राज्य कर रहे थे तथा अनेक जुल्म कर रहे थे), और जो अत्याचार कर रहे हैं, उन सबका भी नाश होगा !

यह तो आजादी से पहले कि अत्यंत करुनामय स्तिथि थी जब रामायण के अन्य उद्देशो को भूल कर रामायण का प्रमुख उद्देश संतो द्वारा यह बना दिया गया कि श्री राम राक्षसों का अंत करने के लिया आए  थे, लेकिन आज क्यूँ? आज क्या मजबूरी है कि हिंदू समाज को पूरी बात नहीं बताई जा रही है ?


कलयुग मैं कर्म ही पूजा, पसंदीदा युग मनुष्य के लिये
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KARMA IS WORSHIP IN KALYUG..BEST YUG FOR HUMANS TO LIVE


कलयुग को कर्मश्रेष्ट युग माना जाता है! इस युग में सिर्फ कर्म का ही फल मिलता है ! पूजा, भक्ति, गुरु के आश्रम में जा कर सेवा, यह सब आपको सही कर्म करने के लिये प्रेरित करता हैं, यह अपने आप में धर्मअनुसार कर्म नहीं है ! धर्मअनुसार कर्म वोह है जो की व्यक्ती अपनी उन्नति के लिये, अपने परिवार, तथा अपने पूरे परिवार, तथा जिस समाज, मोहल्लें, या सोसाइटी मैं वो रह रहा है, उसकी उनत्ति के लिये पूरी निष्ठा व् इमानदारी से करता है! ऐसा करते हुए वो समाज मैं प्रगती भी कर सकता है व् घन अर्जित भी कर सकता है !


यहाँ यह स्पष्टीकरण आवश्यक है कि निष्ठा व् इमानदारी से कार्यरत रहने का यह भी आवश्यक मापदंड है कि वह व्यक्ति समस्त नकरात्मक सामाजिक बिंदुओं का भौतिक स्थर पर विरोध करेगा , जैसे कि भ्रष्टाचार, कमजोर वर्ग तथा स्त्रीयों पर अत्याचार, पर्यावरण को दूषित करना या नष्ट करना, आदी, !


एक और उदहारण लेते हैं ! १००० वर्ष की गुलामी की लम्बी अवधि में ऐसे अनेक अवसर आये जब यदी समस्त राज्य मिल कर विदेशी हमलावरों का मुकाबला करते तो भारत का इतिहास कुछ और होता ! यह भी सही है कि समस्त राजा वीरतापूर्वक लड़े, लेकिन लड़े अलग अलग, और इतिहास आपको बताता है कि कितना व्यापक विनाश था ! यह किसी भी मानक से सही कर्म , या धार्मिक कर्म नहीं कहला सकता !


आपसब को फिर से आश्वस्त करदेना चाहता हूं कि कलयुग मानव के लिये सब से श्रेष्ठ युग है !


कलयुग सबसे श्रेष्ट युग मनुष्य के रहने के लिये
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BETTER YUG FOR HUMANS TO LIVE IN.. KALYUG
कलयुग सबसे श्रेष्ठ युग है मनुष्य के लिये! यहाँ यह बात इस लिये नहीं कही जा रही क्यूँकी हम कलयुग मैं रह रहे हैं, परन्तु इसलिये की यही सच है ! इस तत्य के बारे मैं विस्तृत चर्चा भी करी जा सकती है, ताकी हर कोइ इस सत्य को समझ सके! गुलामी के समय, क्यूँकी अनेक अत्याचार हिंदू समाज को सहने पड़ रहे थे, तो उस समय भावनात्मक तरीके से हिंदुओं को समझाने के लिये यह कह दिया जाता था कि “कलयुग है, या घोर कलयुग है, कष्ट तो सहने पडेंगे”, लेकिन आज क्यूँ? आज तो हमें यह मालूम होना चाहिये कि सच क्या है !

यहाँ जितने भी संभावित मापदंड हैं उनसे यह समझने की कोशिश करेंगे कि क्या कलयुग वास्तव मैं मनुष्य के लिये कष्टदायक युग है ! यह इसलिये भी आवश्यक है क्यूँकी कुछ धार्मिक नेता, श्रोषण करने की नियत से, बार बार यह कह रहे हैं कि कलयुग तो कष्टदायक युग है ! युग की संकल्पना हिंदू शास्त्रों पर आधारित है, इसलिये समस्त मापदंड , हिंदू शास्त्र मैं ही मिलेंगे !


सत्यम शिवम सुन्दरम से अपने जीवन को समझीये 
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अब हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि हम अपना जीवन सत्यम शिवम सुन्दरम से और मधुर कैसे बना सकते हैं ! जीवन की गुणवत्ता हर हिंदू के लिया महत्व रखती है, और विशेष बात यह है कि कलयुग मैं यह भौतिक है, आद्यात्मिक नहीं !


आगे बढ़ने से पहले कुछ चर्चा जीवन की गुणवत्ता पर कर ले ! इस शब्दावली को आज का संसार समझ नहीं पा रहा है ! विज्ञान अभी तक भौतिक मापदंड निर्धारित नहीं कर पारहा है कि जीवन की गुणवत्ता क्या होनी चाहिये !इसे समझने के लिये आज के कुछ मानकों पर विचार करते हैं ! विज्ञान कि प्रगत्ति ने जीवन मैं अनेक सुधार करें हैं , यह प्रमाणित सत्य है ! यदी हरेक छेत्र को अलग अलग देखा जाय तो हम पाएंगे कि सब छेत्र मैं सुधार हैं ! स्वास्थ, संचार, परिवहन, मैं विशेष प्रगति है !निजी आराम और उपयोगिताओं, मनोरंजन, बुनियादी ढांचे, मैं भी प्रगति है !


सत्यम शिवम सुन्दरम का सरल अर्थ 
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सत्यम शिवम सुन्दरम भगवान शिव के वर्णण करने का एक तरीका है ! परन्तु इसका यदी अर्थ समझ लिया जाय तो व्यक्ती अपने जीवन को सुंदर, पृथ्वी और ब्रह्मांड के अनुकूल बना सकता है ! आपका जीवन मधुर और सार्थक हो जायेगा ! इस पोस्ट को लिखते समय इस बात का ध्यान रखा गया है कि सब कुछ सरल भाषा मैं हो!

हिंदू मान्यता के अनुसार, विश्व का कार्य तीन भागो मैं है, जो इस प्रकार है :
1. श्रृष्टि रचेता: चुकी श्रृष्टि की रचना अत्यंत जटिल कार्य है, ब्रह्मा जी ब्रम्ह्लोक से उसका मार्गदर्शन करते हैं ! ब्रम्ह्लोक या गृह ब्रम्ह्लोक कहाँ है यह किसी को पता नहीं, पृथ्वी पर तो यह नही है; अतः वैज्ञानिक दृष्टि से श्रृष्टि की रचना पूर्णत: पृथ्वी सम्बंधित नहीं है ! कुछ मानक पृथ्वी से बाहर हैं, जिनका प्रभाव पड़ता है !
2. पालनकर्ता : भगवन विष्णु श्रृष्टि का पालन करते है! उनका निवास विष्णुलोक, या वैकुण्ठ है ! यह भी पृथ्वी पर नहीं है! अतः कुछ मानक पृथ्वी से बाहर हैं, जिनका प्रभाव पड़ता है !
3. संघारकर्ता : भगवन शिव इस की जिम्मेदारी लेते है ! उनका निवास स्थान हिमालय है! अतः संघार के समस्त मानक पृथ्वी पर है; कोइ भी मानक बाहर नहीं है !


सीता का त्याग राम ने क्यूँ करा... सही तथ्य
http://awara32.blogspot.com/2011/11/blog-post_30.html

यहाँ यह जानना आवश्यक है कि अग्नि परीक्षा उस समय कि एक उचत्तम मर्यादा थी जिसको धार्मिक मान्यता भी प्राप्त थी ! विजई सेना के प्रमुख की हैसियत से श्री राम का उस समय की मर्यादा का पालन सर्वथा उचित्त भी था !
तत्पश्यात अयोध्या पहुँच कर श्री राम ने अयोध्या का राज्य संभाल लिया, तथा सीता अयोध्या की महारानी बन गयी ! राज्य के दूत, नियमित रूप से राजा को, राज्य की समस्त सुचना दिया करते थे! कुछ सूचनाएं सीता से सम्बंधित थी! शुरू मैं तो उनकी अपेक्षा कर दी गयी, परन्तु जब व्यापक शेत्र से सूचना आने लगी तो विषय गंभीर हो गया ! राजा राम के पास सीमित विकल्प थे ! उन्होंने अपनी स्वंम की अध्यक्षता मैं एक न्याय पीठ का गठन करा जिसमे सीता को अपनी बात कहने का मौका दिया तथा प्रजा को अपनी!


मुख्या आरोप सीता के विरुद्ध जनता का यह था, कि रावण एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण था तथा सर्व संपन्न था ! उसने सीता को भिक्षा मैं माँगा ! सीता लक्ष्मण रेखा लांघ कर स्वेच्छा से रावण के साथ गयी थी! बाद मैं राम के पास कोइ अधिकार नहीं था कि वो इतना खून बहा कर सीता को वापस लाये, तथा महारानी बना दें!


त्रेता युग के विमान, विज्ञानिक प्रगती और रामायण
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उसका एक उद्धारण तो हम सब को मालुम है; शिव धनुष जो की प्रलय स्वरूप, विनाशकारी था(WEAPON OF MASS DESTRUCTION), और जिसको बनाने के लिये विकसित विज्ञान की आवश्यकता थी, वोह श्री राम से पूर्व त्रेता युग मैं था !

सारे संकेत यह दर्शाते हैं कि विज्ञान उस समय आज से कहीं ज्यादा विकसित था ! कुछ उन्ही संकेतों पर हम यहाँ पर चर्चा करेंगें ! लेकिन इससे पहले यह आवश्यक है कि हम यह समझ लें कि उन संकेतो को अब तक नक्कारा कैसे गया है ! बहुत ही आसान तरीके से; जहाँ जहाँ विज्ञान का असर दिखाई दिया, वहाँ यह समझा दिया गया कि रामायण के चरित्रों के पास अलोकिक और चमत्कारिक शक्तियां थी ! पुराने समय मैं यह बात ठीक भी थी, चुकी विज्ञान सम्बंधित सुचना का आभाव था, लेकिन आज क्यूँ?


त्रेता युग विज्ञान और विमान का युग था
http://awara32.blogspot.com/2011/11/blog-post.html

त्रेता युग विज्ञान और विमान का युग था ! और यह बात भारत का प्राचीन इतिहास बताता है; रामायण जो की त्रेता युग का इतिहास है वोह बताता है ! लेकिन क्या हम उसका लाभ ले पा रहे हैं? क्या हमारे धार्मिक गुरुओं ने युवा हिंदू छात्रों को शोघ  के लिये प्ररित करा ? और अगर नहीं करा तो क्यूँ नहीं करा? 


ध्यान रहे अगर हमारे धार्मिक गुरुजनों ने आजादी के बाद सिर्फ इतना कर दिया होता, कि रामायण को इतिहास मान लिया होता, तो आज हिंदू समाज की प्रतिष्ठा विश्व मैं उच्त्तम होती ! हम कर्महीन नहीं होते और कम से कम अपने ही देश मैं द्वित्य श्रेणी के नागरिक नहीं होते! लेकिन ऐसा नहीं हो पाया!


धार्मिक आद्यात्मिक साधू तथा गुरु की परिभाषा
http://awara32.blogspot.com/2011/10/blog-post_31.html

हिंदू धर्म मैं यह परेशानी इस लिये भी है की धर्म शब्द के दो अलग अर्थ और प्रयोग हैं | एक तो सनातन धर्म या HINDU RELIGION जो की इस बात की जानकारी देता है की सनातन धर्म क्या है और कौन उसमें आतें हैं ! दूसरा धर्म का अर्थ है भौतिक तरीके से अपनी समाज मैं जिम्मेदारियों को निभाना ! यही दूसरा धर्म स्वर्ग की सीडी है !

अब आप सरल भाषा मैं पूर्ण परिभाषा समझीये :


हिंदू आजादी के बाद भी घुट घुट कर जी रहा है
http://awara32.blogspot.com/2011/10/blog-post_28.html

1000 वर्ष की गुलामी के बाद हमें आज़ादी मिली और आजादी के ६४ वर्ष पूरे हो चुकें हैं | वक्त आ गया है कि समीक्षा करी जाए कि हिंदू समाज इन ६४ वर्षों मैं कहाँ पहूँचा; तथा हमने क्या पाया और क्या खोया |


निम्लिखित तत्त्व आप सबको भी मालूम है फिर भी एक बार गौर फर्मा लें :
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हिंदुओं का भौतिक धर्म गुलामी के समय कैसे घटाया गया
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संषेप मैं नीचे प्रस्तुत है कि भौतिक(PHYSICAL) धर्म को गुलामी के समय कैसे घटाया गया :
1. चुकी अविवाहित कुमारी कन्याओं को जबरदस्ती उठा कर ले जाया जाता था, तो कम उम्र मैं शादी का प्रचलन चालू हो गया |
2. कन्यायों के साथ जो जुल्म और अत्याचार हो रहा था, तथा चुकी उससे निबटने का का कोइ विकल्प नहीं था, इसलिये लोग कन्या के पैदा होते ही उसे मारने लगे |
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आवश्यकता है हिंदुओं की मानसिकता बदलने की, ताकी वो बदलाव और सुधार ला सकें
http://awara32.blogspot.com/2011/10/blog-post_27.html

हिन्दुस्तान मैं जो भी समस्याएँ हैं वो इस लीये हैं क्यूंकि हिंदू पूरी तरह से कर्महीन जीवन बिता रहा है; इस मानसिकता को बदलना होगा | यह मानसिकता १००० वर्ष की गुलामी की देंन है | आजादी के बाद इसे बदलने का कोइ प्रयास नहीं करा गया |


निम्लिखित कुछ PHYSICAL VERIFIABLE PARAMETERS हैं जो कि धर्म की सफलता/असफलता समाज मैं दर्शाते है:


श्री राम की अनावश्यक आलोचना समाप्त करने मैं सहायता करें
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जबभी किसी स्त्री पर कहीं भी अत्याचार होता है, समाज के कुछ लोग यह कह कर उसकी आलोचना करते हैं कि भगवान श्री राम ने भी सीता कि अग्नि परीक्षा ली थी और इसके बाद भी माता सीता का त्याग कर दिया |

और उसका कारण यह है कि जब सुचना का अभाव था तो उस समय हिंदू समाज को संतुष्ट करने के लीये एक स्पष्टीकरण डाल दिया गया था, कि श्री राम ने सीता को चुपके से(ध्यान रहे चुपके से –बिना किसी को बताए; और जब लक्ष्मण भी नहीं थे) अग्नि देव को सौंप दिया और सीता कि छाया रख ली|